Skip to content
SarvaKosh
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

Page 67 of 235

Read in context
Page 67

वार्योविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

४५

इन विधानों पर से यह भली भांति स्पष्ट हो जाता है कि षड्‌रसवादी, ओषधि व अन्न का आस्वादों में वर्गीकरण करके उनके द्वारा वातपित्तश्लेष्माओं के तथा शारीरधातुओं के वृद्धि और ह्रास का होना स्वीकार करते थे। फिर भी उनका यह कथन था कि उक्त धातु साम्य अथवा वैषम्य रस गत गुणों के कारण होता है। इस पर से यह भी ज्ञात होता है कि षड्‌रसवादी, यद्यपि ओषधि अथवा अन्न संज्ञक सचेतन द्रव्यों का गुर्वादि गुणों में वर्गीकरण नहीं करते थे तथापि गुरुत्वादि स्वभावों का षड्‌रसों में अस्तित्व स्वीकार करते ही थे। इस पर गुर्वादि गुण प्रधानता वादियों का यह कथन था कि जब कि षड्‌रसों में गुरुत्वादि स्वभावों का अस्तित्व और उनके द्वारा साम्य वैषम्य का होना स्वीकार करना ही पड़ता है तब ओषधि व अन्न का इन गुणों में वर्गीकरण करना और उनको साम्य वैषम्य कर मानना ही उचित है।

पंचात्मक लोक पक्षीय दोनों प्रकार का वर्गीकरण करते थे फिरभी उनका अंतिम विश्लेषण पंचधात्वात्मक ही था और इसी हेतु से वे षडास्वादों की उत्पत्ति आकाशादिकों के न्यूनतातिरेक से प्रतिपादन करते थे। इनमें जो द्रव्य प्रधानतावादी थे वे द्रव्य को प्रधान मानते थे। उनका कथन था कि मधुरादि जिह्वा वैषयिक भाव, ( अर्थ ) गुरुत्वादि स्वभाव