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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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परिशिष्ट

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भावों के प्रतिष्ठार्थ ही हृदय है। हृदय के आवात से मूर्च्छा और भेद से मरण होता है। वह परभोज का स्थान है और उसमें चैतन्य का संग्रह है”।

सारांश यहाँ हृदय स्थित धातुप्रसाद को साधक पित्त शब्द से संबोधित किया गया है और सम्भवतः आत्मा को अग्नि शब्द से। आत्मा को अग्नि शब्द से संबोधित करना तत्कालीन प्रथा के अनुरूप ही है। सिवाय यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त साधकपित्त कल विवेचन उन संप्रदायों के द्वारा किया गया है जो ‘वायु द्रव्य’ का प्राणादि प्रकारों में वर्गीकरण करते थे। ये जिस तरह द्रवत धातुप्रसाद को पित्त कहते हैं उस तरह नेत्रगत धातुप्रसाद को भी पित्त कहते हैं।

आलोचक पित्तः—इसके विषय में यह कहा है किः—

यत् दृष्ट्वा पित्तं तस्मिन् आलोचकोऽग्निरिति

संज्ञा, स रूपग्रहणेऽधिकृतः॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त दृष्टि में रहता है उसको आलोचक अग्नि कहते हैं। वह रूप ग्रहण करता है।

दृष्टि के विषय में यह कहा गया है किः—

नेत्रायामग्निभागं तु कृष्णमंडलमुच्यते ।

कृष्णात् सप्तमभिच्छंति दृष्टि दृष्टिविशारदाः ॥

पक्षमवर्त्मश्वेतकृष्णदृष्टीनां मंडलानि तु ।

अनुपूर्वं तु ते मध्याश्वत्वारोऽत्या यथोत्तरम् ॥

(सु. सू. अ. १)