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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

क्योंकि प्रायः सभी आर्य वैज्ञानिक हृदय धातुप्रसाद में लिंगदेहधारी जीवात्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। उपनिषदों में यह कहा गया है कि “हृदय कमल के भीतर सूक्ष्मतर आकाश में अपने अन्न (तन्त्र धातुप्रसाद ) के सहारे ‘जीवात्मा’ स्थित है। हृदय कमल से एक तो एक ( प्रत्यक्ष में अभी एक का ज्ञान हुआ है ) सूक्ष्म ज्ञान वाहिनियों निकलती हैं जिनके कि सहस्रों प्रश्नखाएँ होती हैं। हूकमलस्थ लिंग देहधारी आत्मा, इन नाडियों द्वारा बुद्धि, मन, इन्द्रिय इनके विषयों की जानकारी प्राप्त करता है। “मैं हूँ” इसमें जो ‘अहंभाव’ अथवा व्यक्तित्व है वह जीवात्मा का परिचय है। योगी, इस जीवात्मा को ‘उदान’ वायु के द्वारा ‘सुषुम्ना’ नाडी के रास्ते से ऊपर मूर्द्धा में मैं ले जाते हैं और वहाँ (शिव रहता है) जीव शिवात्मैक्य का अनुभव करते हैं। योगी, इस जीवात्मा में लीन होकर जो चाहता है वही प्राप्त करता है।” (छांदोग्य, बृहदारण्य, तैत्तिरीय, मुंड और कंड से संग्रहित) और आयुर्वेद में भी यह कहा गया है कि:—

“षडंगमंगं विज्ञानभिद्रियाण्यर्थपंचकम् ।
आत्मा च सगुणश्वेतश्विन्तयं च हृदि संश्रितम् ॥
प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते ।
गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थाचित्तैः ।
तस्योपघातान्मूच्छार्थं भेदान्मरणमूच्छति ।
तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंप्रहः ॥
हृदयं महदर्थक्ष्म तस्मादुक्तं चिकित्सकैः ।

अर्थात् हृदय, षडंग शरीर का केंद्र है, उसमें ही अर्थ ज्ञान और विज्ञान होता है। सगुण आत्मा और मन हृदय में ही रहते हैं। उक्त