आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
मसूरदलमात्रों तु पंचभूतप्रसादजाम् ।
खद्योतविस्फुल्लिगामां सिद्धां तेजोभिरन्यैः ॥
आवृतां पटलेनाक्षणोर्बोहान विवराकृतिम् ।
क्षीतसात्स्यां नृणां दृष्टिमाहुर्नयनचित्ताकाः ॥
( सु. उ. अ. ७ )
नेत्र में बाह्यपटल के पीछे जो ' कृष्ण मंडल ' दिखाई देता है उसके पीछे रंगीन धातुओं का बना हुआ विवर युक्त ' दृष्टि मंडल ' है । शारीर शास्त्र दृष्ट्या दृष्टिमंडल गत विवर को ' दृष्टि ' कहते हैं । ' दृष्टि ' शब्द का यदि इतना ही अर्थ स्वीकार किया जाय तो इस दृष्टि में अथवा विवर में जो ' तेजोजल ' भरा हुआ है उसको ' आलोचक ' पित्त कहना होगा । यह दृष्टि में बाह्यपटल से भीतर तृतीयपटल ( अक्षिकाच Lens ) तक भरा हुआ है । अतएव यह कहा भी है कि ' सिद्धां तेजोभिरन्यैः ' और ' तेजोजलाश्रितं बाह्यम् ' इ० । यह तेजोजल, रक्त से परीजने वाला एक तरल है । इन्द्रिय धर्म शास्त्र की दृष्टि से यह तेजोजल ' वक्त्रीकरण सहित्यों ' में से एक है । इसके द्वारा प्रकाश किरणों का ' वक्त्रीभवन ' होता है ।
किंतु ' रूप ग्रहण ' की दृष्टि से विचार किया जाय तो यहाँ ' दृष्टि ' शब्द का अर्थ अधिक व्यापक करना होगा । रूप ग्रहण अथवा आलोचन शब्द, यद्यपि सामान्यतः उन सब व्यापारों के वाचक हैं जिनसे कि बाह्य दृष्य का प्रतिबिंब, चतुर्थपटल के 'लिंग' भाग पर पाडा जाता है तथापि उसका विशेष अर्थ ' रूप ज्ञान ' है और वह अभिप्रेत भी मादूम होता है । ऋषियों को यह भली भांति मादूम था कि रूप ज्ञान में ' लिंग ' भाग ही प्रधान कारण है और लिंग