आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextहिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
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हैं वे गर्भ को, शरीर को, अथवा धातुपंचक को चेतना का अधिष्ठान कहना स्वीकार नहीं करते थे अपितु चेतनाधातु को ही उनका सबका अधिष्ठान कहते थे। अतः उनका यह कथन था कि:—
एवम् अनया एव युक्त्या पंचमहाभूतविकारसमुदाया-
त्मको गर्भः। चेतना तु अधिष्ठान भूतः। स हि अस्य षष्ठो-
धातुरुक्तः। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् इस युक्ति स इतना
ही सिद्ध होता है कि “ गर्भ, पंचमहाभूतों के विकारों का
समुदाय ” है और यह मान्य भी है। पर वह चेतना का
अधिष्ठान नहीं है बल्कि चेतना ही उसका अधिष्ठान है।
क्योंकि गर्भ के जिस तरह उक्त पांच धातु हैं उसी तरह
चेतना भी उसका छठा धातु है।
षड्धातुवादियों का यह सामान्य सिद्धांत है कि:—
खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः।
चेतनाधातुरन्येकः स्मृतः पुरुष संज्ञकः॥ ( च. शा. )
अर्थात् आकाशादि पांच और चेतना इन छः धातुओं के
समुदाय को पुरुष कहते हैं। और अकेला चेतनाधातु भी
‘ पुरुष ’ संज्ञक है। तहां चेतनाधातु-पुरुष के विषय में इनका
यह कथन है कि:—