आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
सहि हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता संता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽन्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्राधान्यमन्यत्वं जीवो ज्ञः प्रकृतल्लेखतानावात् विमुभूतात्माचंद्रियात्माचांतरात्माचेति । ( च. शा. अ. ४ )
इस में कतिपय विशेषणों का स्पष्टीकरण आत्मवाद के विवेचन में किया गया है। धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप इत्यादि विशेषण विराट् पुरुष के अथवा लोकाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। और भूतात्मा, इंद्रियात्मा, क्षेत्रज्ञ, जीवात्मा इत्यादि विशेषण देहाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। तहां भूतात्मा अथवा इंद्रियात्मा को 'शरीरधात्वात्मा' भी कहते हैं। जैसा कि 'शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतांऽगान्दगात्संभवति' । ( च. शा. अ. ४ ) क्षेत्रज्ञ, अथवा जीवात्मा कर्मानुसार एक देह को छोड़ कर ( मनोजवो देहमुपैति देहात् ) दूसरे देह में प्रवेश करता है। यथा ' क्षेत्रज्ञः.....दैव संयोगात्.....भूतात्मना सह अन्वक्षं गर्भाशयमनु-प्रविश्यावतिष्ठते । ( सु. शा. अ. ३ )
' गुणी ' यह विशेषण महत्वपूर्ण है। चक्रपाणि दत्त ने इसका अर्थ ' भूतरूपगुणवान् ' करके यह भी कहा है कि ' गुणोऽप्रवान्, प्रधानं चात्मा, तव्यतिरिक्तानि भुतानि गुणाः '। सारांश आत्मा, गुणी होकर आकाशादिक उसके ' गुण ' हैं। आगे भी ' गुणग्रहणाय ' ' गुणोपादानम् ' इत्यादि स्थलों