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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् पुरुष, षड्धातुओं से पैदा होता है और रोग भी षड्धातुओं से पैदा होते हैं। आद्यसारंख्यों ने भी (सारंख्यों में इनको ‘आद्यसारंख्य’ कहा जाता था) हेतुज पुरुष को षड्धातुओं का समुदाय ही कहा है।

यज्ञःपुरुषीय परिषद् में हिरण्याक्ष यद्यपि वार्योंविद् के रसवाद का प्रतिवाद करते हुए दिखाई देते हैं तथापि ये मुख्यतः भारद्वाज के धातुपंचकवाद के प्रतिस्पर्धी हैं।

हम यहां यह कहने का साहस करते हैं कि हिरण्याक्ष जिस षड्धातुवाद का समर्थन करते हैं उसका अभ्युत्थान भी ऐतिहासिक दृष्ट्या धातुपंचकवाद में से ही हुआ होगा।

धातुपंचकवाद में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इनको ‘अभूत’ और समस्त अचेतन सचेतन जगत् के ‘धारक’ कहा जाता था। और चेतना को इनका ही परिणाम माना जाता था। फलतः गर्भोत्पत्ति के विषय में भारद्वाज का यह कथन था किः—

गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाण्वगितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः। (च. शा. अ. ४) अर्थात् गर्भ आकाशादि धातुपंचक का विकार होकर चेतना का अधिष्ठान है।

किंतु जिनको यह ज्ञात हो गया था कि चेतनाधातु ही स्वतः सिद्ध है और आकाशादिक ‘भूत’ अर्थात् पैदा हुए