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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

उक्त प्रकृति विवेचन के कारण तदुत्तर कालमें प्राकृत वैकृत शब्दों की कुछ व्याख्या बदल गई अर्थात् प्रकृतिजनक वातपित्तश्लेष्माओं को ही प्राकृत और शेष दोषों को वैकृत कहने की प्रवृत्ति शुरू हुई। इसका स्पष्ट निर्दर्शन अष्टांग संग्रह के निम्न लिखित अंशापर से होता है। जैसा कि:—

द्विविधा वातादयः प्राकृता वैकृताश्च । तत्र प्राकृताः सप्तविधायाः प्रकृते हेतुभूताः, शरीरैकजन्मानः, ते शरीरधारणा द्वातुसंज्ञाः, दोषारूढ्यानां विकृतीनां बीजभूताः ।....वैकृतास्तु गर्भादभिनिःसृतस्य, आहाररसस्य मलाः संभवन्ति प्राकृतेष्वबरोहंति, ते कालादिविभेन स्वप्रमाण वृद्धिक्षययोगात् देह-मनुगृण्वंति दूषयंति च । [ अ. सं. शा. अ. ८ ] अस्तु।

शब्दादिगुणप्रधानतावादां पांचभौतिकी प्रकृति मानते थे। जैसा कि:—प्रकृतिभिहनराणां भौतिकी केचिदाहुः पञ्चनदहनतायैः कीर्तितास्तास्तु तिष्ठः । स्थिर विपुल शरीरः पार्थिवश्वश्वमावान् शुचिरथ चिरजीवी नामसः खैर्महेंद्रः ॥ (सु. शा. अ. ४)

उक्त प्रकृति विषयक अन्वेषण क कारण ही यह कहा जाने लगा कि “ वात पित्त श्लेष्माण एव देह संभव हेतवः ” [ सु. सं. ] अर्थात् वातपित्तश्लेष्मा ही देहोत्पादक कारण है।