आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 101 of 235
Read in contextबार्बोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
७९
इनका तापमान ९७ से ९८ तक क्रमोबशी हुआ करता है। मस्तिष्क, श्वसन संस्था, स्थुलांत्र, मूत्रबस्ति और आस्थियों में व्याधि प्रवणता रहती है। नाडीसंस्था, उत्तेजित और विषय प्राहिता उत्तम किंतु स्मृति कम रहती है। बाल्यों के आने के पूर्व स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ रहता है। जहां सर्दी गर्मी का अंतर बड़ा हो वहां स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
उक्त लक्षण एक दोषाधिक प्रकृति के हैं। इन पर से ही द्विदोषाधिक और समप्रकृति के लक्षणों का अनुमान करना चाहिये। सामान्यतः यह देखा गया है कि 'वातपित्त' प्रकृति के मनुष्यों में दो प्रकार हैं; एक वमन से बहुत घबराते हैं और दूसरों को नशा करने की आदत बहुत जल्दी लगती है और वह छुड़ाए नहीं छूटती। वातकफ-प्रकृति मनुष्य वमन से प्रसन्न रहते हैं। उनको हर ऋतुओं के संधि में प्रतिद्वय होजाता है। इनको फोड़ा फुन्सी बहुत कम होते हैं। कफपित्तप्रकृति के मनुष्य बड़े कष्टसह होते हैं। इनकी व्यधियों का निदान करना और चिकित्सा करना कठिन होता है। इनमें कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको संगीत की शक्ति बहुत कम होती है।
इन प्रकृतियों के विषय में यह भी कहा गया है कि:—
प्रकोपो वान्यथाभावः क्षयो वा नोपजायते।
प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥