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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वातपित्तश्लेष्माओं का लोकगत अधिष्ठान.

षड्रसवादी वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध लोकगत वायु, सूर्य और सोम ( चंद्र ) के साथ मस्थापित करते थे । क्योंकि इनके वर्ष, ऋण, शीत लक्षण जागतिक प्रभावों का और वातपित्तश्लेष्माओं के चय, प्रकोप, प्रक्षमों का घनिष्ठ संबंध अच्छी तरह सिद्ध हो चुका था । इस विषय में किसी को कुछ भी शंका नहीं थी । पर प्रत्येक संप्रदाय, अपने २ स्मृतिविज्ञान के अनुसार उक्त लोकगत ' विभूतियों ' का भी समन्वय मूलभूत द्रव्यों, गुणों अथवा धर्मों में करता था और तदनुसार वातपित्तश्लेष्माओं को भी द्रव्य, गुण, अथवा धर्म कहता था ।

धातुपंचकवादी भारद्वाज, जिस तरह शरीरगत धातु प्रसाद, ओज, तेज इन सचेतन द्रव्यों का शरीरगत अचेतन धातुपंचक में विशेषतः वायु, अग्नि, उदकों में समन्वय करते थे ( जैसा कि अष्टांगसंग्रहोक्त " वाण्वाकाशाभ्यां धातुः, आग्नेयं पित्तम्, अंबुषुषिबीभ्यां श्लेष्मा " और सौश्रुतिक "वायु-रात्मनैवात्मा, आग्नेयं पित्तम्, श्लेष्मा सोम्य इति" इन विधानों पर से सिद्ध होता है ) उसी तरह वायु, सूर्य, चंद्र इन जागतिक विभूतियों का भी धातुपंचक में समन्वय करते थे । सारांश उनकी दृष्टि में वातपित्तश्लेष्माओं का और वायु सूर्य चंद्र का अंतिम समन्वय धातुपंचक में होता था । इस