अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु.. (५)
अंतरिक्ष अर्थात् मध्यमलोक हमें अभय प्रदान करे. ये दोनों द्यावा और पृथ्वी हमें अभय
प्रदान करें. पीछे से, आगे से, ऊपर से तथा नीचे से हमें अभय प्राप्त हो. (५)
अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरो यः.
अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु.. (६)
हमें मित्रों से तथा शत्रुओं से अभय प्राप्त हो. हम प्रत्यक्ष और परोक्ष जनों से भयभीत न
हों. दिन में और रात में हमें अभय प्राप्त हो. सभी दिशाएं मेरे लिए मित्र के समान हित करने
वाली हों. (६)
सूक्त-१६ देवता—मंत्र में कहे गए
असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नो अभयं कृतम्.
सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः.. (१)
हे सब के प्रेरक सविता देव! पूर्व दिशा में हमें शत्रु रहित बनाओ तथा पश्चिम दिशा को
भी हमारे शत्रुओं से शून्य कर दो. सविता देव उत्तर दिशा में तथा शची के पति इंद्र दक्षिण
दिशा में मेरी रक्षा करें. (१)
दिवो मादित्या रक्षन्तु भूम्या रक्षन्त्वग्नयः.
इन्द्राग्नी रक्षतां मा पुरस्तादश्विना—
वभितः शर्म यच्छताम्.
तिरश्चीनघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म.. (२)
आदित्य अर्थात् अदिति के पुत्र सभी देव द्युलोक में मेरी रक्षा करें. भूमि संबंधी उपद्रवों
से तीन अग्नियां मेरी रक्षा करें. इंद्र और अग्नि पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. सूर्य के पुत्र एवं देवों
के वैद्य अश्विनीकुमार सभी ओर से मुझे सुख प्रदान करें. जातवेद अग्नि सभी दिशाओं में मेरी
रक्षा करें. भूतों और पिशाचों की रक्षा करने वाले देव सभी ओर से हमारी रक्षा करें. (२)
सूक्त-१७ देवता—मंत्र में कहे गए
अग्निर्मा पातु वसुभिः पुरस्तात् तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि.
स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (१)
पृथ्वी स्थानीय देव अग्नि वसु नाम वाले देवों के साथ पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर
रखने की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें,
जहां मैं जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं सभी प्रकार से रक्षक अग्नि के प्रति समर्पण
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