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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 853 of 1063

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Page 853

असपत्नाः प्रदिशो मे भवन्तु न वै त्वा द्विष्मो अभयं.. (१)
मैं ने श्रेष्ठ फल के रूप में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है. द्यावा और पृथिवी मुझे
उत्तम फल देने वाले हों. पूर्व आदि उत्तम दिशाएं मेरे लिए शत्रु रहित हों. हे विरोधी! मैं तुझ से
द्वेष न करूँ, इसलिए मुझे अभय प्राप्त हो. (१)
सूक्त-१५ देवता—इंद्र एवं मंत्र में कहे गए
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि.
मघवञ्छग्धि तव त्वं न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि.. (१)
हे अभय करने वाले इंद्र! हम भयभीत हैं. इसलिए हमारे भय के कारण उपद्रव को
समाप्त कर के हमें भय रहित बनाइए. हे धनवान इंद्र! तुम अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा
करने के लिए समर्थ बनो. तुम हमारे शत्रुओं को नष्ट करो तथा हमारे शत्रु संबंधी संग्रामों में
हमें विजयी बनाओ. (१)
इन्द्रं वयमनूराधं हवामहे ऽ नु राध्यास्म द्विपदा चतुष्पदा.
मा नः सेना अरुषीरुप गुर्विषूचीरिन्द्र द्रुहो वि नाशय.. (२)
सब अपनेअपने कार्यों की सिद्धि के लिए इंद्र से ही प्रार्थना करते हैं. हम क्रम के
अनुसार पूजनीय इंद्र का आह्वान करते हैं. इंद्र की कृपा से हम दो पैरों वाले सेवकों तथा चार
पैरों वाले पशुओं से संपन्न बनें. हमारे मन चाहे फल में बाधा डालने वाली शत्रुसेनाएं हमारे
सामने न आएं. हे इंद्र! सब स्थानों पर फैली हुई शत्रु सेनाओं का नाश करो. (२)
इन्द्रस्त्रातोत वृत्रहा परस्फानो वरेण्यः.
स रक्षिता चरमतः स मध्यतः स पश्चात् स पुरस्तान्नो अस्तु.. (३)
वृत्र असुर का अथवा जल रोकने वाले मेघ का वध करने वाले इंद्र हमारे रक्षक हों. वरण
करने योग्य इंद्र शत्रुओं से हमारी रक्षा करने वाले हैं. वे ही इंद्र अंत में, मध्य में, पीछे और आगे
हमारी रक्षा करने वाले हों. (३)
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्व१र्यज्ज्योतिरभयं स्वस्ति.
उग्रा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप क्षयेम शरणा बृहन्ता.. (४)
हे इंद्र! तुम सब कुछ जानते हो. तुम हमें इहलोक और विस्तृत स्वर्गलोक का सुख प्राप्त
कराओ. स्वर्ग को व्याप्त करने वाला प्रकाश हमें भय रहित कर के सुख प्रदान करे. हे इंद्र!
तुम महान हो. शत्रुओं का संहार करने में समर्थ, शत्रुओं से रक्षा करने वाली एवं विशाल आप
की भुजाओं की हम शरण में जाते हैं. (४)
अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे.
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