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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 855

करता हूं. यह हवि अग्नि को प्राप्त हो. (१)
वायुर्मान्तरिक्षेणैतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये क्रमे तां पुरं
प्रैमि.
स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (२)
अंतरिक्ष के स्थायी देवता वायु अंतरिक्ष में एवं पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने
की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं
जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं वायु के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वायु को
प्राप्त हो. (२)
सोमो मा रुद्रैर्दक्षिणाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि.
स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (३)
सोम देवता रुद्र नाम के देवों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर
रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां
मैं जाऊं. वे मेरा हित साधन करें. मैं सोम के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सोम को
प्राप्त हो. (३)
वरुणो मादित्यैः रेतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि.
स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (४)
वरुण आदित्यों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया
में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें एवं मेरा हित साधन
करें, जहां मैं जाऊं. मैं वरुण के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वरुण को प्राप्त हो.
(४)
सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्यां प्रतीच्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां
पुरं प्रैमि.
स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (५)
सूर्य देवता द्यावा और पृथ्वी के साथ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की
क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा एवं मेरा हित साधन
करें, जहां मैं जाऊं. मैं सूर्य देव के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सूर्य को प्राप्त हो.
(५)
आपो मौषधीमतीरेतस्या दिशः पान्तु क्रमे तासु श्रये तां पुरं प्रैमि.
त् मा रक्षतु सन्तु मा गोपायता तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (६)
जल ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों वाली पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने
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