अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअभि गोत्राणि सहसा गाहमानो ऽ दाय उग्रः शतमम्युरिन्द्रः.
दुश्च्यवनः पृतनाषाडयोध्यो ३ स्माकं सेना अवतु प्र युत्सु.. (७)
इंद्र युद्ध क्षेत्र में अपनी शक्ति से शत्रु सेना के सामने से प्रवेश करने वाले, दयाहीन, क्रोध
करने वाले एवं प्रचंड पराक्रमी हैं. ये शत्रुओं की सेना को वश में कर लेते हैं. कोई भी इन्हें
युद्ध क्षेत्र से भगाने में समर्थ नहीं है. ये शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले हैं. इन से युद्ध
करने में कोई भी समर्थ नहीं है. इस प्रकार के इंद्र युद्धों में हमारी सेना की रक्षा करें. (७)
बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्रां अपबाधमानः.
प्रभञ्जञ्छत्रून् प्रमृणन्नमित्रानस्माकमेध्यविता तनूनाम्.. (८)
हे देवों का पालन करने वाले बृहस्पति! तुम रथ में बैठ कर युद्ध में सभी ओर गमन
करो. तुम राक्षसों का वध करने वाले एवं शत्रुओं को बाधा पहुंचाने वाले हो. तुम शत्रुओं को
सभी ओर से नष्ट करते हुए एवं उन की हिंसा करते हुए हमारे शरीरों के रक्षक बनो. (८)
इन्द्र एषां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः.
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्तु मध्ये.. (९)
हमारे शत्रुओं को सामने से नष्ट करने के लिए विजय प्राप्त करने वाली देव सेनाओं के
इंद्र नेता हैं. बृहस्पति इन देव सेनाओं की दक्षिण दिशा में चलें. यज्ञ और सोम इन के आगे
चलें तथा मरुद्गण इन सेनाओं के मध्य भाग में गमन करें. (९)
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्.
महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (१०)
कामनाओं को पूर्ण करने वाले अथवा निरंतर शस्त्रों की वर्षा करने वाले इंद्र, शत्रुओं को
युद्ध भूमि से भगाने वाले वरुण, मरुद्गण तथा आदित्य शत्रुओं को वश में करने वाली शक्ति
सहित प्रकट हों. आदित्य शत्रुओं को इस लोक से भी दूर भगाने में समर्थ हैं. वे शत्रुओं पर
विजय प्राप्त करें. सभी देवों की जयध्वनि उठे. (१०)
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु.
अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्मान् देवासो ऽ वता हवेषु.. (११)
ध्वजाओं वाले संग्रामों के प्राप्त होने पर इंद्र हमारे रक्षक हों. हमारे बाण शत्रुओं पर
विजय प्राप्त करें. हमारे वीर उत्तर दिशा में अथवा उत्तम स्थिति में हों. हे देवो! आप सब भी
संग्रामों में हमारी रक्षा करो. (११)
सूक्त-१४ देवता—द्यावा पृथ्वि
इदमुच्छ्रेयो ऽ वसानमागां शिवे मे द्यावापृथिवी अभूताम्.
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