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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 832 of 1063

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Page 832

परा यात पितरः सोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पूर्व्याणैः.
अधा मासि पुनरा यात नो गृहान् हविरत्तुं सुप्रजसः सुवीराः.. (६३)
हे सोमरस प्राप्त करने के अधिकारी पितरो! तुम पितृयानों से अपने लोक को गमन
करो तथा अमावस्या के दिन हवि भक्षण करने हेतु हमारे घर पुनः आना. हमारे घर शोभन
पुत्रों और उत्तम वीरों से युक्त हों. (६३)
यद् वो अग्निरजहादेकमङ्गं पितृलोकं गमयंजातवेदाः.
तद् व एतत् पुनरा प्याययामि साङ्गाः स्वर्गे पितरो मादयध्वम्.. (६४)
हे प्रेत! तुम्हारे जिस अंग को अग्नि ने दूर फेंक कर भस्म नहीं किया है. उसे मैं पुनः
अग्नि में डाल कर तुम्हारी वृद्धि करता हूं. तूम पूर्ण अंग वाले हो कर स्वर्ग की ओर गमन
करते हुए प्रसन्नता प्राप्त करो. (६४)
अभूद् दूतः प्रहितो जातवेदाः सायं न्यह्न उपवन्द्यो नृभिः.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि.. (६५)
हम ने प्रातः और सायं काल वंदना के योग्य अग्नि को दूत बना कर पितरों के पास
भेजा है. हे अग्नि! हमारी हवियों को तुम पितरों को प्रदान करो. हे अग्नि! वे पितर उन
हवियों का सेवन करें. इस के पश्चात जो हवि तुम्हें दी गई है, तुम भी उस का सेवन करो.
(६५)
असौ हा इह ते मनः ककुत्सलमिव जामयः.
अभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (६६)
हे प्रेत! तेरा मन उस श्मशान में है. हे श्मशान भूमि! इस प्रेत को तुम उसी प्रकार ढको,
जिस प्रकार स्त्रियां अपने कंधों को वस्त्र से ढकती हैं. (६६)
शुम्भन्तां लोकाः पितृषदनाः पितृषदने त्वा लोक आ सादयामि.. (६७)
हे प्रेत! तेरे बैठने के लिए पितरों के लोक प्रकट हों. मैं तुझे उसी लोक में प्रतिष्ठित
करता हूं. (६७)
ये ३ स्माकं पितरस्तेषां बर्हिरसि.. (६८)
हे कुश! तू हमारे पूर्वज पितरों के बैठने का स्थान बन. (६८)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय.
अधा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (६९)
हे वरुण! तुम अपने उत्तम, मध्यम और निकृष्ट पाशों अर्थात् फंदों को हम से दूर रखो.
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