अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextये च जीवा ये च मृता ये जाता ये च यज्ञियाः.
तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधारा व्युन्दती.. (५७)
जो जीवित हैं, जो मर गए हैं, जो उत्पन्न हुए हैं तथा जो भविष्य में जन्म लेने वाले हैं,
इन सब के लिए उमड़ती हुई जलधारा वाली छोटी नदी प्राप्त हो. (५७)
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सूरो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः.
प्राणः सिन्धूनां कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्दिमाविशन्मनीषया.. (५८)
स्तुति करने वालों को मनचाहा फल देने वाला सोम कपड़े से छान कर तैयार किया
जाता है. यह सोम दिन और रात्रियों को प्रेरित करने वाला है. उषाकाल और प्रकाश को भी
यही बढ़ाता है. यह नदियों के जलों का प्राण है. कलशों की ओर जाता हुआ यह सोम बहुत
शब्द करता है. यह सोम तीनों सवनों में पूज्य इंद्र के पेट में प्रवेश करे. (५८)
त्वेषस्ते धूम ऊर्णोतु दिवि षञ्छुक्र आततः.
सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे.. (५९)
हे प्रेत! तेरा धुआं मेघ का रूप धारण कर के अंतरिक्ष को ढक ले. तुम स्तुति के कारण
प्रदीप्त हो कर सूर्य के समान प्रकाशित होते हो. (५९)
प्र वा एतीन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतिं सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरः.
मर्य इव योषाः समर्षसे सोमः कलशे शतयामना पथा.. (६०)
कपड़े से छनता हुआ यह सोम इंद्र के पेट में जाता है. यह यज्ञ करने वाले के लिए मित्र
के समान है तथा उस की इच्छित कामना यह व्यर्थ नहीं करता. यह सोम पुरुष के स्त्री से
मिलने के समान सहस्रों धाराओं में मिलता है. (६०)
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रियाँ अधूषत.
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा यविष्ठा ईमहे.. (६१)
कुशों पर रखे गए पिंडों को खा कर पितर तृप्त हुए तथा उन्होंने अपने शरीरों को कंपित
किया. इस के पश्चात वे हमारी प्रशंसा करने लगे. उन तृप्त पितरों से हम अपने लिए मनचाहे
वरदान की याचना करते हैं. (६१)
आ यात पितरः सोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पितृयाणैः.
आयुरस्मभ्यं दधतः प्रजां च रायश्च पोषैरभि नः सचध्वम्.. (६२)
हे पितरो! आप सोमरस प्राप्त करने योग्य हो. तुम गंभीर पितृयानों से आ कर पिंडदान
के लिए बिछाए गए कुशों पर तिल बिखेरने वाले हमें दीर्घ जीवन तथा पुत्रों एवं पौत्रों के रूप
में संतान प्रदान करो तथा हमें धन की समृद्धि से मिलाओ. (६२)
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