अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइदं पितृभ्यः प्र भरामि बर्हिर्जीवं देवेभ्य उत्तरं स्तृणामि.
तदा रोह पुरुष मेध्यो भवन् प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम्.. (५१)
संस्कार करने वाले पुरुष! पितरों और देवताओं के जीवन की कामना करता हुआ मैं
कुशों को फैलाता हूं. हे मृत पुरुष! तू योग्य होता हुआ इन कुशाओं पर बैठा. पितर यहां से
गए हुए तुझ प्रेत को इन कुशों पर बैठने की अनुमति दें. (५१)
एदं बर्हिरसदो मेध्यो ऽ भूः प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम्.
यथापरु तन्वं १ सं भरस्व गात्राणि ते ब्रह्मणा कल्पयामि.. (५२)
हे प्रेत! चिता के समीप बिछे हुए कुशों पर बैठ कर तू पवित्र हो गया है. तू दहन से शुद्ध
हो गया है. यहां से गए हुए पितर तुझ को जान लें. तू जोड़ों के अनुसार अपने शरीर को पूर्ण
कर. मैं मंत्रों के द्वारा तेरे अंगों को समर्थ बनाता हूं. तात्पर्य यह है कि मैं मंत्रों के द्वारा तुझे
शक्ति प्रदान करता हूं. (५२)
पर्णो राजापिधानं चरुणामूर्जो बलं सह ओजो न आगन्.
आयुर्जीवेभ्यो वि दधद् दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (५३)
ढाक का पत्ता चरुओं का ढक्कन है. इस पलाश पत्र से हमें अन्न, बल, शत्रु का नाश
करने का सामर्थ्य तथा तेज प्राप्त हो. यह पलाश पत्र हमें सौ वर्ष की आयु वाला बनाए. (५३)
ऊर्जो भागो य इमं जजानाश्मान्नानामाधिपत्यं जगाम.
तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः स नो यमः प्रतरं जीवसे धात्.. (५४)
चरु रूप अन्न के अधिकारी जिन यमराज ने इसे प्रेत बनाया है, जो यम इन चरुओं को
ढकने वाले पत्थरों के स्वामी हैं, हे बंधुओ! उन यम देव को हवियों के द्वारा संतुष्ट करो. वे
दीर्घ जीवन के हेतु हमारा पोषण करे. (५४)
यथा यमाय हर्म्यमवपन् पञ्च मानवाः.
एवा वपामि हर्म्यं यथा मे भूर्यो ऽ सत.. (५५)
जिस प्रकार पांच मनुष्यों ने यमराज के लिए घर बनाया है, उसी प्रकार मैं भी घर
बनाता हूं. इस प्रकार मेरे बहुत से घर हो जाएं. (५५)
इदं हिरण्यं बिभृहि यत् ते पिताबिभः पुरा.
स्वर्गं यतः पितुर्हस्तं निर्मृग्ढि दक्षिणम्.. (५६)
हे मरणासन्न पुरुष! तू इस सोने को धारण कर, जिसे तेरे पिता ने पहले धारण किया
था. हे पुरुष! तू स्वर्ग को जाते हुए अपने पिता के दाएं हाथ को सुशोभित कर. (५६)
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