Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 828 of 1063

Read in context
Page 828

स्वधां पितृभ्यो अमृतं दुहाना आपो देवीरुभयांस्तर्पयन्तु.. (३९)
यह मधुर जल पुत्र, पौत्र आदि को पूर्ण तृप्त करता है, ये दिव्य पितरों के लिए स्वधा
तथा अमृत का दोहन करते हुए पुत्र और पौत्र दोनों को तृप्त करें. (३९)
आपो अग्निं प्र हिणुत पितॄँरुपेमं यज्ञं पितरो मे जुषन्ताम्.
आसीनासूर्जमुप ये सचन्ते ते नो रयिं सर्ववीरं नि यच्छान्.. (४०)
हे जल! अग्नि को पितरों के पास भेजो. मेरे पितृगण इस यज्ञ का सेवन करते हैं. जो
पितर हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्न का सेवन करते हैं, वे हमें निरंतर वीरत्व तथा धन
संपत्ति देते रहें. (४०)
समिन्धते अमर्त्यं हव्यवाहं घृतप्रियम्.
स वेद निहितान् निधीन् पितॄन् परावतो गतान्.. (४१)
मरणधर्म से रहित अर्थात् अमर और घी को प्रेम करने वाली तथा हव्यों को वहन करने
वाली अग्नि को पितृगण प्रदीप्त करते हैं. ये अग्नि दूर चले गए पितरों को जानते हैं. (४१)
यं ते मन्थं यमोदनं यन्मांसं निपृणामि ते.
ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्रुतः.. (४२)
हे प्रेत! मैं तेरे लिए जो मंथ अर्थात् दही मथने से प्राप्त मक्खन दे रहा हूं, यह तुझे स्वधा
और घृत से संपन्न हो कर प्राप्त हो. (४२)
यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः.
तास्ते सन्तूद्ध्वीः प्रभूवीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्.. (४३)
हे प्रेत! ये काले तिलों से मिश्रित तथा स्वधा से पूर्ण खीलें परलोक की प्राप्ति पर तुझे
विस्तृत रूप में प्राप्त हों. यमराज तुझे इन को खाने की अनुमति दें. (४३)
इदं पूर्वमपरं नियानं येना ते पूर्वे पितरः परेताः.
पुरोगवा ये अभिषाचो अस्य ते त्वा वहन्ति सुकृतामु लोकम्.. (४४)
इस लोक में प्राणी जिस के माध्यम से यात्रा करते हैं, मृतक को ढोने वाली वह गाड़ी
प्राचीन और नवीन दोनों प्रकार की है. हे प्रेत! इसी के द्वारा तेरे पूर्व पुरुष ढोए गए थे. इस के
दोनों ओर जोड़े गए दोनों बैल तुझे पुण्यात्माओं का लोक प्राप्त कराएं. (४४)
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने.
सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४५)
मृतक का दाह संस्कार करने वाले पुरुष अग्नि की इच्छा करते हुए सरस्वती का
ebook converter DEMO Watermarks*