अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextप्रजापति, परमेष्ठी पिता और पितामह उस के पीछे चले. (२५)
प्रजापतेश्च वै स परमेष्ठिनश्च पितुश्च पितामहस्य च प्रियं धाम भवति य एवं
वेद.. (२६)
जो पुरुष इस बात को जानता है, वह प्रजापति, परमेष्ठी, पिता और पितामह का प्रिय
धाम होता है. (२६)
सूक्त-७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स महिमा सद्भूत्वान्तं पृथिव्या अगच्छत् स समुद्रो ऽ भवत्.. (१)
वह बड़ा समर्थ और गतिशाली हो कर पृथ्वी के अंत तक गया है और वह सागर बन
गया. (१)
तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चापश्च श्रद्धा च वर्षं भूत्वानुव्य
वर्तयन्त.. (२)
उस के साथ प्रजापति, परमेष्ठी, पिता, पितामह श्रद्धा और वृष्टि हो कर रहने लगे. (२)
ऐनमापो गच्छन्त्यैनं श्रद्धा गच्छन्त्यैनं वर्षं गच्छति य एवं वेद.. (३)
जो इस बात को जानता है, जल उसे प्राप्त होते हैं. उसे श्रद्धा और वर्षा प्राप्त होती है.
(३)
तं श्रद्धा च यज्ञश्च लोकश्चान्नं चान्नाद्यं च भूत्वाभिपर्यावर्तन्त.. (४)
श्रद्धा, यज्ञ, लोक अन्न और खानपान उस के चारों ओर रहने लगे. (४)
ऐनं श्रद्धा गच्छत्यैनं यज्ञो गच्छत्यैनं लोको गच्छत्यैनमन्नं गच्छत्यैनमन्नाद्यं गच्छति य एवं
वेद.. (५)
जो यह जानता है, उसे श्रद्धा प्राप्त होती है, उसे लोक प्राप्त होते हैं. उस को अन्न प्राप्त
होता है और उस को खानपान प्राप्त होता है. (५)
सूक्त-८ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
सो ऽ रज्यत ततो राजन्यो ऽ जायत.. (१)
वह अनुरक्त हुआ. उस के बाद वह राजा बन गया. (१)
स विशः सबन्धूनन्नमन्नाद्यमभ्युदतिष्ठत्.. (२)
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