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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 748

वह प्रजाओं के, बंधुओं के अन्न के और खानपान के अनुकूल व्यवहार करने लगा. (२)
विशां च वै स सबन्धूनां चान्नस्य चान्नाद्यस्य च प्रियं धाम भवति य एवं
वेद.. (३)
जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं, अन्नों और खानपान का प्रिय धाम होता है.
(३)
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स विशो ऽ नु व्य चलत्.. (१)
उस ने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१)
तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्.. (२)
इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२)
सभायाश्च वै स समितेश्च सेनायाश्च सुरायाश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद..
(३)
इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३)
सूक्त-१० देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१)
श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्चते..
(२)
ऐसा विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस राजा का अतिथि हो, राजा उस का सम्मान करे. ऐसा
करने से व्रात्य राष्ट्र को तथा क्षत्र शक्ति को नष्ट नहीं करता. (१-२)
अतो वै ब्रह्म च क्षत्रं चोदतिष्ठतां ते अब्रूतां कं प्र विशावेति.. (३)
इस के बाद ब्रह्म बल और क्षात्र शक्ति को हम किस में प्रवेश करें. (३)
अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्रा विशत्विन्द्रं क्षत्रं तथा वा इति.. (४)
ब्रह्मबल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रवेश करे. (४)
अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्राविशदिन्द्रं क्षत्रम्.. (५)