अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextय आशानामाशापालस्तुरीयो देवः स नः सुभूतमेह वक्षत्.. (३)
हे धन देने वाले देव कुबेर! मैं अपने अभिमत धन आदि प्राप्त करने के लिए हवि से इंद्र
आदि देवों की प्रसन्नता के लिए हवन करता हूं. दिशाओं की रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों में
जो चौथे देव कुबेर हैं, वे इस यज्ञ में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें. (३)
स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः.
विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव दृशेम सूर्यम्.. (४)
हमारी माता, हमारे पिता, हमारी गायों और सारे संसार का कल्याण हो. हमारी माता
आदि उत्तम धन एवं श्रेष्ठ ज्ञान वाले हैं. हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें. (४)
सूक्त-३२ देवता—द्यावा पृथिवी
इदं जनासो विदथ महद् ब्रह्म वदिष्यति.
न तत् पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः.. (१)
हे जानने के इच्छुक जनो! इस बात को जानो कि वह जल रूप ब्रह्म पृथ्वी पर नहीं
रहता और न वह आकाश में निवास करता है. उसी जल के कारण सभी वृक्ष एवं लताएं
जीवित रहती हैं. (१)
अन्तरिक्ष आसां स्थाम श्रान्तसदामिव.
आस्थानमस्य भूतस्य विदुष्टद् वेधसो न वा.. (२)
जिस प्रकार गंधर्वों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण
रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो
भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं
जानते. (२)
यद् रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्.
आर्द्रं तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव स्रोत्याः.. (३)
हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले
बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का
जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार
सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं. (३)
विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधिश्रितम्.
दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः.. (४)
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