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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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सारा संसार आकाश से चारों ओर से घिरा हुआ है. यह संसार पृथ्वी पर आश्रित है. मैं
संसार के धन के रूप में स्थित द्युलोक को तथा पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (४)
सूक्त-३३ देवता—जल
हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः सविता यास्वाग्निः.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (१)
सोने के रंग की शुद्ध अग्नियां एवं सविता जिन जलों से उत्पन्न हुए हैं, बादलों में स्थित
जिन जलों में विद्युत रूपी अग्नि तथा सागर में स्थित जिन जलों में वाडवाग्नि उत्पन्न हुई है,
जिन शोभन रंग वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए
रोग नाशक और सुखकारक हों. (१)
यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम्.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (२)
राजा वरुण जिन जलों के मध्य में स्थित हो कर मनुष्यों के सत्य और असत्य को जानते
हुए चलते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल
हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (२)
यासां देवा दिवि कृण्वन्ति भक्षं या अन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (३)
इंद्र आदि देव जिन जलों के सार रूप अमृत को द्युलोक में भक्षण करते हैं तथा जो जल
अनेक प्रकार से स्थित रहते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण
किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (३)
शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे.
घृतश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (४)
हे जल के अभिमानी देव! मुझे सुखकर दृष्टि से देखो तथा अपने कल्याणकारी शरीर से
मेरी देह का स्पर्श करो. जो जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं, वे हमारे
लिए रोग विनाशक और सुखकारी हों. (४)
सूक्त-३४ देवता—मधु, वनस्पति
इयं वीरुन्मधुजाता मधुना वा खनामसि.
मधोरधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि.. (१)
यह सामने वर्तमान लता मधुर रस से युक्त भूमि में उत्पन्न हुई है. मैं इसे मधुर रूप वाले
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