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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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कराने वाले चावलों की हिंसा करे. (१८)
विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्त्सयोनिर्लोकमुप याह्येतम्.
वर्षवृद्धमुप यच्छ शूर्पं तुषं पलावानाप तद् विनक्तु.. (१९)
हे ओदन! तू घृतपृष्ठ अर्थात् घी की पीठ वाला हो कर मत आ. तू परलोक में हमारे साथ
प्रकट होने के लिए हमारे पास आ और वर्षा ऋतु में प्रवृद्ध उपकरण वाले रूप को प्राप्त हो.
वह तुझ से भूसी को अलग करे. (१९)
त्रयो लोका: संमिता ब्राह्मणेन द्यौरेवासौ पृथिव्य१न्तरिक्षम्.
अंशून् गृभीत्वान्वारभेथामा प्यायन्तां पुनरा यन्तु शूर्पम्.. (२०)
आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी इन तीनों लोकों को ब्राह्मण प्राप्त कराता है. हे पति और
पत्नी! तुम चावलों को फटकना आरंभ करो. यह धान उछालते हुए सूप को प्राप्त हो. (२०)
पृथग् रूपाणि बहुधा पशूनामेकरूपो भवसि सं समृद्ध्या.
एतां त्वचं लोहिनीं तां नुदस्व ग्रावा शुम्भाति मलग इव वस्त्रा.. (२१)
हे धान! पशु विभिन्न रूपों वाले होते हैं, परंतु तू एक ही रूप वाला है. तू पाषाण के
द्वारा अपनी भूसी का त्याग कर. (२१)
पृथिवीं त्वा पृथिव्यामा वेशयामि तनू: समानी विकृता त एषा.
यद्यद् द्युत्तं लिखितमर्पणेन तेन मा सुस्रोर्ब्रह्मणापि तद् वपामि.. (२२)
हे मूसल! तू पृथ्वी का बना हुआ है. इसलिए तू पृथ्वी ही है. पृथ्वी की तथा तेरी देह एक
समान है. इसलिए मैं पृथ्वी को ही पृथ्वी पर मार रहा हूं. हे ओदन! मूसल के प्राप्त होने से तेरे
अंग में जो पीड़ा हो रही है, उस पीड़ा से तू भूसी से अलग हो कर छूट जा. मैं तुझे मंत्र द्वारा
अग्नि को अर्पित करता हूं. (२२)
जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या.
उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषिक्ता.. (२३)
माता जिस प्रकार अपने पुत्र को प्राप्त करती है, उसी प्रकार मैं मूसल रूपी पृथ्वी को
पृथ्वी से मिलाता हूं. वेदी में भी ओखली रूपी कुंभी अर्थात् पकाने वाला पात्र है, इसलिए तू
व्यथित मत हो. तू यज्ञ के आयुधों द्वारा घृत से युक्त की जा चुकी है. (२३)
अग्नि: पचन् रक्षतु त्वा पुरस्तादिन्द्रो रक्षतु दक्षिणतो मरुत्वान्.
वरुणस्त्वा दृंहाद्धरुणे प्रतीच्या उत्तरात् त्वा सोम: सं ददातै.. (२४)
अग्नि पाचन अर्थात् पकाने के कर्म में तेरी रक्षक हो. इंद्र पूर्व से, मरुद्गण दक्षिण से,
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