अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहमारे यथार्थ संकल्प को जानो. (१२)
यद्यत् कृष्णः शकुन एह गत्वा त्सरन् विषक्तं बिल आससाद.
यद्वा दास्या ३ र्द्रहस्ता समङ्क्त उलूखलं मुसलं शुम्भतापः.. (१३)
कौवे ने कपट कर के इस में बिल बनाया हो अथवा दासी ने भीगे हुए हाथ से मूसल
और उलूखल का स्पर्श कर लिया हो, तब भी यह मंगलकारक हो. (१३)
अयं ग्रावा पृथुबुध्नो वयोधाः पूतः पवित्रैरप हन्तु रक्षः.
आ रोह चर्म महि शर्म यच्छ मा दम्पती पौत्रमघं नि गाताम्.. (१४)
यह दृढ़ पाषाण हवि धारण करने वाला है. यह शुद्ध हो कर राक्षसों को नष्ट करे. हे
ओदन! तू चरम पर आता हुआ कल्याण करने वाला हो. इस दंपती के पौत्र को उन का पाप
न छू सके. (१४)
वनस्पतिः सह देवैर्न आगन् रक्षः पिशाचाँ अपबाधमानः.
स उच्छ्रायैतै प्र वदाति वाचं तेन लोकां अभि सर्वांजयेम.. (१५)
यह वनस्पति राक्षसों और पिशाचों को रोकती हुई हम को प्राप्त हुई है. वह हमें उच्च
स्वर वाला तथा सभी लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला बनाए. (१५)
सप्त मेधान् पशवः पर्यगृह्णन् य एषां ज्योतिष्माँ उत यश्चकर्श.
त्रयस्त्रिंशद् देवतास्तान्सचन्ते स नः स्वर्गमभि नेष लोकम्.. (१६)
इन चावलों में जो पतला, परंतु अधिक चमकता हुआ है, ऐसे सात चावलों को लोगों ने
पशु के समान ग्रहण किया है. यह तैंतीस देवताओं के द्वारा सेवन करने योग्य है. यह ओदन
हम को स्वर्ग में पहुंचाए. (१६)
स्वर्गं लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रैः स्याम.
गृह्णामि हस्तमनु मैत्वत्र मा नस्तारीन्निर्ऋतिर्मो अरातिः.. (१७)
हे ओदन! तू हमें स्वर्ग में लिए जा रहा है. वहां हम स्त्रीपुरुषों सहित प्रकट हों. पाप
देवता निर्ऋति और शत्रु वहां हम को अपने वश में न करें इसलिए तू अनुगमन कर. मैं तेरे
हाथ को पकड़ रहा हूं. (१७)
ग्राहिं पाप्मानमति ताँ अयाम तमो व्यस्य प्र वदासि वल्गु.
वानस्पत्य उद्यतो मा जिहिंसीर्मा तण्डुलं वि शरीर्देवयन्तम्.. (१८)
हे वनस्पति! तुम पाप से उत्पन्न होने वाले अंधकार को दूर करते हुए मधुर शब्द करती
हो. हम अपने पापों से पार हो जाएं. यह वनस्पति मेरी हिंसा न करे और न मुझे देवमार्ग प्राप्त
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