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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 657

वरुण पश्चिम से तथा सोम उत्तर दिशा की ओर से तेरी रक्षा करें. (२४)
पूताः पवित्रैः पवन्ते अभ्राद् दिवं च यन्ति पृथिवीं च लोकान्.
ता जीवला जीवधन्याः प्रतिष्ठाः पात्र आसिक्ताः पर्यग्निरिन्धाम्.. (२५)
पुण्य कर्मों द्वारा शुद्ध हुए जल तुझे शुद्ध करने वाले हों. वे मेघों द्वारा आकाश में जाते
और फिर पृथ्वी पर आ कर मनुष्यों की सेवा करते हैं. जल पृथ्वी से पुनः अंतरिक्ष में पहुंचते
हैं तथा प्राणियों को सुखी करने वाले पात्र में स्थित होते हैं. अग्नि इन आसक्त होने वाले जलों
को सभी ओर दीप्त करें. (२५)
आ यन्ति दिवः पृथिवीं सचन्ते भूम्याः सचन्ते अध्यन्तरिक्षम्.
शुद्धाः सतीस्ता उ शुम्भन्त एव ता नः स्वर्गमभि लोकं नयन्तु.. (२६)
आकाश से आने वाले ये जल पृथ्वी की सेवा करते हैं तथा पृथ्वी से पुनः आकाश में
पहुंचते हैं. ये पवित्र जल पवित्रता देने वाले हैं. ये जल हम को स्वर्ग की प्राप्ति कराएं. (२६)
उतेव प्रभ्वीरुत संमितास उत शुक्राः शुचयश्चामृतासः.
ता ओदनं दंपतिभ्यां प्रशिष्टा आपः शिक्षन्तीः पचता सुनाथाः.. (२७)
ये जल श्वेत रंग वाले, दमकते हुए एवं अमृत के समान हैं. हे जलो! इस दंपती द्वारा
डाले जाने पर ओदन को शुद्ध करते हुए पकाओ. (२७)
संख्याता स्तोकाः पृथिवीं सचन्ते प्राणापानैः संमिता ओषधीभिः.
असंख्याता ओप्यमानाः सुवर्णाः सर्वं व्यापुः शुचयः शुचित्वम्.. (२८)
प्राण, अपान तथा समान स्वरूप ओषधियों से युक्त पृथ्वी का सेचन करते हैं और
शोभन वर्ण वाले जीवों में प्रविष्ट असंख्य जल शुद्धता देते हुए प्राप्त होते हैं. (२८)
उद्योधन्त्यभि वल्गन्ति तप्ताः फेनमस्यन्ति बहुलांश्च बिन्दून्.
योषेव दृष्ट्वा पतिमुत्वियायैतैस्तण्डुलैर्भवता समापः.. (२९)
ताप देने पर ये जल शब्द करते हैं तथा बूंदों को उड़ाते हुए युद्ध सा करते हैं. हे जलो!
जिस प्रकार पति को देख कर पत्नी उस से मिल जाती है, उसी प्रकार तुम ऋतु में होने वाले
यज्ञ के निमित्त चावलों में मिल जाओ. (२९)
उत्थापय सीदतो बुध्न एनानद्भिरात्मानमभि सं स्पृशन्ताम्.
अमासि पात्रैरुदकं यदेतन्मितास्तण्डुलाः प्रदिशो यदीमाः.. (३०)
हे ओदन की अधिष्ठात्री देवी! मूसल की जड़ से व्यथित होते हुए इन चावलों को
उठाओ. ये जल से मिलें. हे यजमान! तू जल को पात्रों द्वारा नाप रहा है. इधर ये चावल भी
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