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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 654 of 1063

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लोकों को प्राप्त करो तथा संतान से संपन्न होते हुए वृद्धावस्था तक जीवित रहो। (६)
प्राचींप्राचीं प्रदिशमा रभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते.
यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पती सं श्रयेथाम्.. (७)
हे पति और पत्नी! तुम पूर्व की ओर बढ़ो. उस स्वर्ग पर श्रद्धालु जन ही चढ़ पाते हैं.
तुम ने जो पका हुआ ओदन अग्नि पर रखा है उस की रक्षा के लिए खड़े रहो. (७)
दक्षिणां दिशमभि नक्षमाणौ पर्यावर्तेथामभि पात्रमेतत्.
तस्मिन् वां यमः पितृभिः संविदानः पक्वाय शर्म बहुलं नि यच्छात्.. (८)
हे पति और पत्नी! तुम दक्षिण की ओर जा कर इस की प्रदक्षिणा करते हुए आओ.
असमय पितरों से सहमत हुए यमराज तुम्हारे ओदन के लिए अनेक प्रकार के कल्याण प्रदान
करें. (८)
प्रतीची दिशामियमिद् वरं यस्यां सोमो अधिपा मृडिता च.
तस्यां श्रयेथां सुकृतः सचेथामधा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (९)
पश्चिम दिशा में स्वामी और सुख देने वाला व्योम है, इसलिए यह दिशा श्रेष्ठ मानी जाती
है. तुम इस दिशा में पके हुए ओदन को रख कर पुण्य कर्मों का फल प्राप्त करो. फिर इस
पके हुए ओदन के प्रभाव से तुम दोनों स्वर्ग और पृथ्वी पर प्रकट होओ. (९)
उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावद् दिशामुदीचीं कृणवन्नो अग्रम्.
पाङ्क्तं छन्दः पुरुषो बभूव विश्वैर्विश्वाङ्गैः सह सं भवेम.. (१०)
उत्तर दिशा प्रजाओं से युक्त है. यह श्रेष्ठ दिशा हम को श्रेष्ठता प्रदान करे. पंक्ति छंद
ओदन के रूप में प्रकट होता है. हम भी पृथ्वी और स्वर्ग को अपने सभी अंगों सहित प्राप्त
हों. (१०)
ध्रुवेयं विराणनमो अस्त्वस्यै शिवा पुत्रेभ्य उत मह्यमस्तु.
सा नो देव्यदिते विश्ववार इर्य गोपा अभि रक्ष पक्वम्.. (११)
यह वरण करने योग्य तथा खंड न होने वाली पृथ्वी है. यह हमारे लिए सुख देने वाली
हो. यह हमारे पुत्रों का मंगल करे तथा नियुक्त रक्षक के समान यह ओदन की रक्षा करे. (११)
पितेव पुत्रानभि सं स्वजस्व नः शिवा नो वाता इह वान्तु भूमौ.
यमोदनं पचतो देवते इह तन्नस्तप उत सत्यं च वेत्तु.. (१२)
हे पृथ्वी! जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों का आलिंगन करता है, उसी प्रकार तुम इस
ओदन का आलिंगन करो. यहां मंगलमय वस्तु प्रवाहित हो. तुम हमारे ओदन को तपाओ तथा
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