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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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करने वाली है, उस ने इस शरीर में रंग भरा है. (१७)
यदा त्वष्टा व्यतृणत् पिता त्वष्टुर्य उत्तरः.
गृहं कृत्वा मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (१८)
उस शरीर में आत्मा के रूप में उस का निर्माण करने वाला ईश्वर स्थित है. उस निर्माण
कार्य से भी श्रेष्ठ इस विचित्र संसार का निर्माण करने वाला जो देव है, उस ने निर्माण के समय
पुरुष के शरीर, आंखों, कानों आदि के रूप में छेद किए, तब उस निर्माण देव ने उस पुरुष
शरीर को घर बना कर उस में प्रवेश किया. (१८)
स्वप्नो वै तन्द्रीर्निर्ऋतिः पाप्मानो नाम देवताः.
जरा खालत्यं पालित्यं शरीरमनु प्राविशन्.. (१९)
नींद, आलस्य, पापदेवता एवं ब्रह्महत्या आदि पापों ने इस शरीर में प्रवेश किया.
वृद्धावस्था, नयन आदि का नष्ट होना, त्वचा का ढीला हो जाना आदि के अभिमानी देवों ने
शरीर में प्रवेश किया. (१९)
स्तेयं दुष्कृतं वृजिनं सत्यं यज्ञो यशो बृहत्.
बलं च क्षत्रमोजश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२०)
चोरी, सुरा पीना आदि बुरे कर्म, इन से उत्पन्न पाप, सत्य भाषण, यज्ञ, महान यश, बल
और क्षत्रियों से संबंधित ओज ने इस शरीर में प्रवेश किया. (२०)
भूतिश्च वा अभूतिश्च रातयो ऽ रातयश्च याः.
क्षुधश्च सर्वास्तृष्णाश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२१)
समृद्धि, असमृद्धि अर्थात् संपन्नता और दीनता, मित्र और शत्रु, भूख और प्यास, इन
सब ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२१)
निन्दाश्च वा अनिन्दाश्च यच्च हन्तेति नेति च.
शरीरं श्रद्धा दक्षिणाश्रद्धा चानु प्राविशन्.. (२२)
निंदा और प्रशंसा, हर्ष और शोक, धन की समृद्धि और इच्छा का अभाव— इन्होंने
शरीर में प्रवेश किया. (२२)
विद्याश्च वा अविद्याश्च यच्चान्यदुपदेश्यम्.
शरीरं ब्रह्म प्राविशदृचः सामाथो यजुः.. (२३)
शास्त्र आदि में ज्ञान और अज्ञान ने, अन्य उपदेश योग्य भावों ने, ऋग्वेद, सामवेद और
यजुर्वेद के मंत्रों के पश्चात ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म के अंश आत्मा ने शरीर में प्रवेश किया. (२३)
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