अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदसवां कांड
सूक्त-१ देवता—मंत्र में उक्त
यां कल्पयन्ति वहतौ वधूमिव विश्वरूपां हस्तकृतां चिकित्स्वः.
सारादेत्वप नुदाम एनाम्.. (१)
कृत्या को बनाने वाले उसे दहेज के साथ प्राप्त होने वाली वधू के समान सजाते हैं. हम
उसी कृत्या को भगाते हैं. वह कृत्या हम से दूर चली जाए. (१)
शीर्षण्वती नस्वती कर्णिनी कृत्याकृता संभृता विश्वरूपा.
सारादेत्वप नुदाम एनाम्.. (२)
सिर, नाक, कान आदि अंगों से युक्त बनाई गई कृत्या अनेक प्रकार की आपत्तियां लाती
है. उसे हम भगाते हैं. वह हमारे पास से दूर चली जाए. (२)
शूद्रकृता राजकृता स्त्रीकृता ब्रह्मभिः कृता.
जाया पत्या नुत्तेव कर्तारं बन्ध्वृच्छतु.. (३)
शूद्र के द्वारा निर्मित, राजा के द्वारा निर्मित, स्त्री के द्वारा निर्मित एवं मंत्रों के द्वारा प्रेरित
कृत्या अपने बनाने वाले के समीप उसी प्रकार लौट जाए, जिस प्रकार भाइयों के द्वारा विदा
की गई पत्नी अपने पति के समीप लौट जाती है. (३)
अनया ऽ हमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्.
यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु... (४)
मैं इस जड़ीबूटी के द्वारा समस्त कृत्याओं को क्षेत्र में गायों पर एवं पुरुषों पर की गई
कृत्या को शक्तिहीन कर चुका हूं. (४)
अघमस्त्वघकृते शपथः शपथीयते.
प्रत्यक् प्रतिप्रहिण्मो यथा कृत्याकृतं हनत्.. (५)
पाप उसे प्राप्त हो, जिस ने पाप किया है. शपथ उसी के पास जाए, जिस ने शपथ की
है. मैं कृत्या को इस प्रकार वापस लौटाता हूं कि वह अपने निर्माता का ही विनाश कर दे. (५)
प्रतीचीन आङ्गिरसो ऽ अध्यक्षो नः पुरोहितः.
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