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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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की केवल गति जानी जाती है. (२६)
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ते मनीषिणः.
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति.. (२७)
वाणी के चार निश्चित पद अर्थात् चरण हैं. जो मनीषी ब्राह्मण हैं, वे उन्हें जानते हैं. इन
में से तीन चरण बुद्धि रूपी गुफा में छिपे होने के कारण गति नहीं करते हैं. मनुष्य वाणी के
चौथे चरण का उच्चारण करते हैं. (२७)
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्.
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः.. (२८)
तत्त्वज्ञानी विद्वान् उस दिव्य गतिशील को इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं. यह
दिव्य गतिशील एक है, पर विद्वान् उसे अनेक प्रकार से कहते हैं. वे उसे अग्नि, वायु एवं यम
कहते हैं. (२८)
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