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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 357 of 1063

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Page 357

हे जड़ीबूटी! मेरे शत्रु को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. तू इसे स्त्री के समान
बड़ेबड़े केशों वाला बना दे. इस के पश्चात इंद्र इस के दोनों अंडकोषों को पत्थरों से फोड़
डालें. (२)
क्लीब क्लीबं त्वा ऽ करं वध्रे वध्रिं त्वा ऽ करमरसारसं त्वा ऽ करम्.
कुरीरमस्य शीर्षणि कुम्बं चाधिनिदध्मसि.. (३)
हे नपुंसक! मैं ने तुझे इस अनुष्ठान के द्वारा नपुंसक बना दिया है. हे षंढ अर्थात्
जन्मजात नपुंसक! मैं ने तुझे षंढ बना दिया है. हे वीर्यहीन! मैं ने तुझे वीर्य रहित बना दिया
है. मैं नपुंसक बने हुए इस पुरुष के शीश पर नारियों के शृंगार बने हुए केश समूह को उत्पन्न
करता हूं. (३)
ये ते नाड्यौ देवकृते ययोस्तिष्ठति वृष्ण्यम्.
ते ते भिनद्मि शम्यया ऽ मुष्या अधि मुष्कयो:.. (४)
तेरी ये नाड़ियां विधाता द्वारा बनाई गई हैं, जिन में वीर्य आश्रय लेता है. मैं अंडकोषों पर
स्थित तेरी उन वीर्यवाहिनी नाड़ियों को पत्थर पर रख कर डंडे से तोड़ता हूं. (४)
यथा नडं कशिपुने स्त्रियो भिन्दन्त्यश्मना.
एवा भिनद्मि ते शेपोऽमुष्या अधि मुष्कयो:.. (५)
स्त्रियां चटाई बनाने के लिए जिस प्रकार नड नामक घास को पत्थर से कूटती हैं, हे
शत्रु! मैं तेरे अंडकोषों को उसी प्रकार पत्थर के ऊपर रख कर दूसरे पत्थर से फोड़ता हूं. (५)
सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति
न्यस्तिका रुरोहिथ सुभगंकरणी मम. शतं तव प्रतानास्त्रयस्त्रिंशन्निताना:.
तया सहस्रपर्ण्या हृदयं शोषयामि ते.. (१)
हे शंखपुष्पी! तू दुर्भाग्य के लक्षण को पूरी तरह निगलती हुई उत्पन्न होती है. तू मेरे
सौभाग्य का निर्माण करती है. हे जड़ीबूटी! तेरी सौ शाखाएं तथा तैंतीस जड़ें हैं. हे नारी! इस
हज़ार पत्तों वाली शंखपुष्पी के द्वारा मैं तेरे हृदय को कामाग्नि से संतप्त करता हूं. (१)
शुष्यतु मयि ते हृदयमथो शुष्यत्वास्यम्.
अथो नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (२)
हे कामिनी! मेरे विषय में तेरा हृदय संतप्त हो. तेरा मुख भी सूख जाए इस के अतिरिक्त
तू मेरे प्रति अभिलाषा करती हुई अत्यधिक संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप
आ. (२)
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