अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयस्ते केशो ऽ वपद्यते समूलो यश्च वृश्चते.
इदं तं विश्वभेषज्या ऽ भि षिञ्चामि वीरुधा.. (३)
हे केशों को दृढ़ करने के इच्छुक पुरुष! तेरा जो केश धरती पर गिरता है तथा जो जड़
रहित काटा जाता है, मैं तेरे उन सभी केशों को, केश संबंधी रोगों का विनाश करने वाली
ओषधि से गीला करता हूं. (३)
सूक्त-१३७ देवता—वनस्पति
यां जमदग्निरखनद् दुहित्रे केशवर्धनीम्.
तां वीतहव्य आभरदसितस्य गृहेभ्यः.. (१)
जमदग्नि ऋषि ने अपनी पुत्री के केशों को बढ़ाने वाली जिस ओषधि को खोदा था, उसे
वीतहव्य महर्षि ने अपने केश बढ़ाने के लिए असित केश नामक मुनि के घर से जिसे चुराया
था. (१)
अभीशुना मेया आसन् व्यामेनानुमेयाः.
केशा नडा इव वर्धन्तां शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (२)
हे केशों को बढ़ाने के इच्छुक पुरुष! पहले तेरे केश अंगुलों में (दो अंगुल, चार अंगुल
आदि रूप में) नापने योग्य थे. इस के पश्चात वे दोनों हाथ फैला कर नापने योग्य हो गए. हे
पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नड नामक घास के समान बढ़ें. (२)
दृंह मूलमाग्रं यच्छ वि मध्यं यामयौषधे.
केशा नडा इव वर्धन्ता शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (३)
हे ओषधि, मेरे बालों की जड़ों को दृढ़ बना तथा उन के ऊपरी भाग को लंबा बना. इस
के अतिरिक्त तू मेरे केशों के मध्य भाग को दृढ़ बना. हे पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नई
घास के समान बढ़ें. (३)
सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति
त्वं वीरुधां श्रेष्ठतमा ऽ भिश्रुता ऽ स्योषधे. इमं मे अद्य पूरुषं
क्लीबमॉपशिनं कृधि.. (१)
हे शक्तिहीन करने वाली जड़ीबूटी! तू सभी लताओं में श्रेष्ठ एवं सभी ओर प्रसिद्ध है.
आज मेरे इस शत्रु पुरुष को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. (१)
क्लीबं कृध्योपशिनमथो कुरीरिणं कृधि.
अथास्येन्द्रो ग्रावभ्यामुभे भिनत्त्वाण्ड्यौ.. (२)
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