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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 358 of 1063

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Page 358

संवननीं समुष्पला बभ्रु कल्याणि सं नुद.
अमूं च मां च सं नुद समानं हृदयं कृधि.. (३)
हे पीले पत्तों वाली एवं कल्याण करने वाली जड़ीबूटी! तू वशीकरण करने वाली है. तू
फलों से युक्त हो कर उस नारी को मेरे समीप आने की प्रेरणा दे. इस के पश्चात मुझ कामुक
और कामिनी को मिला दे. (३)
यथोदकमपपुषो ऽ पशुष्यत्यास्यम्.
एवा नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (४)
हे कामिनी! जिस प्रकार जल न पीने वालों का मुंह सूख जाता है, उसी प्रकार तू मेरे
प्रति काम भावना से संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप आ. (४)
यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः.
एवा कामस्य विच्छिन्नं सं धेहि वीर्यावति.. (५)
हे अतिशय वीर्यवर्धक जड़ीबूटी! नेवला जिस प्रकार सांप के टुकड़े कर के पुनः उन्हें
जोड़ता है, उसी प्रकार स्त्री के विमुख होने के कारण जो मुझ में कामविकार आ गया है उसे
दूर कर के मुझे मेरी पत्नी से पुनः मिला दें. (५)
सूक्त-१४० देवता—ब्रह्मणस्पति
यौ व्याघ्राववरूढौ जिघत्सतः पितरं मातरं च.
यौ दन्तौ ब्रह्मणस्पते शिवौ कृणु जातवेदः.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति और हे जातवेद अग्नि! बाघ के समान जो दो दांत ऊपर की पंक्ति में
अतिरिक्त रूप से नीचे की ओर मुंह कर के स्थित हैं, वे मातापिता को खाना चाहते हैं. वे दांत
मातापिता का कल्याण करने वाले हों. (१)
व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्.
एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (२)
हे पहले निकले हुए, ऊपर वाले दो दांतो! तुम गेहूं, जौ, उरद और तिल खाओ. तुम्हारे
रमणीय फल के लिए ही गेहूं, जौ आदि का भाग रखा गया है. तुम माता और पिता की हिंसा
मत करो. (२)
उपहूतौ सयुजौ स्योनौ दन्तौ सुमङ्गलौ.
अन्यत्र वां घोरं तन्व १: परैतु दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (३)
दोनों ऊपर वाले दांत देव के द्वारा अनुमति प्राप्त, मित्र बने हुए, सुखकारक एवं शोभन
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