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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 355 of 1063

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Page 355

हे वज्र! जो शत्रु हमें हानि पहुंचाता है, उसी के समीप जा. जो हमें हानि पहुंचाता है,
उसी को मार. जो शत्रु हमें हानि पहुंचाता है, तू उस के शरीर के भागों को विदीर्ण कर. (३)
सूक्त-१३५ देवता—वज्र
यदश्नामि बलं कुर्व इत्थं वज्रमा ददे.
स्कन्धानमुष्य शातयन् वृत्रस्येव शचीपतिः.. (१)
मैं जो भोजन करता हूं, उस से मुझे बल प्राप्त होता है. उस बल से मैं वज्र पकड़ता हूं.
हे वज्र! इंद्र ने जिस प्रकार राक्षस के शरीर के अवयवों को काट डाला था, उसी प्रकार तू मेरे
शत्रु के शरीर को काट डाल. (१)
यत् पिबामि सं पिबामि समुद्र इव संपिबः.
प्राणानमुष्य संपाय सं पिबामो अमुं वयम्.. (२)
मैं जो जल पीता हूं, उस के द्वारा मानव शत्रु को पकड़ कर उस का रस पीता हूं. जिस
प्रकार सागर नदी मुख से पूरा जल ग्रहण कर के पी जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु का रस पीता
हूं. मैं पहले इस शत्रु के प्राणों को रस बना कर पीता हूं और बाद में इस पूरे शत्रु का विनाश
कर देता हूं. (२)
यद् गिरामि सं गिरामि समुद्र इव संगिरः.
प्राणानमुष्य संगीर्य सं गिरामो अमुं वयम्.. (३)
मैं जो कुछ निगलता हूं, उस के द्वारा अपने मानव शत्रु को ही निगल जाता हूं. जिस
प्रकार सागर नदी के जल को निगल जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु के अंगों को निगलता हूं. मैं
पहले इस शत्रु के अंगों को निगलता हूं और बाद में इसे समाप्त कर देता हूं. (३)
सूक्त-१३६ देवता—वनस्पति
देवी देव्यामधि जाता पृथिव्यामस्योषधे.
तां त्वा नितत्नि केशेभ्यो दृंहणाय खनामसि.. (१)
हे प्रकाश करती हुई, कालमाची नामक जड़ीबूटी! तू दिव्य पृथ्वी में उत्पन्न हुई है. हे
नीचे की ओर जाने वाली जड़ीबूटी! मैं तुझे अपने केशों को दृढ़ करने के लिए खोदता हूं. (१)
दृंह प्रत्नानज्जनयाजातान्जातानु वर्षीयसस्कृधि.. (२)
हे जड़ीबूटी! तू मेरे केशों को दृढ़ बना तथा मेरे जो केश उत्पन्न नहीं हुए, उन्हें उत्पन्न
कर. मेरे जो केश उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें तू अधिक विशाल बना दे. (२)
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