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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 305 of 1063

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Page 305

हम दीप्ति से तथा देह की स्थिति के आधार रस से युक्त हों. हम शरीर के अंगों —
हाथ, पैर आदि से युक्त हों तथा शोभन मन से युक्त हों. त्वष्टा देव हमारे शरीर को शक्ति युक्त
बनाएं तथा हमारे शरीर का जो रोग वाला भाग हैं, उसे अपने हाथ से शुद्ध करें. (३)
सूक्त-५४ देवता—अग्नि, सोम
इदं तद् युज उत्तरमिन्द्रं शुम्भाभ्यष्टये.
अस्य क्षत्रं श्रियं महीं वृष्टिरिव वर्धया तृणम्.. (१)
सभी देवों में श्रेष्ठ इंद्र को मैं अभीष्ट फल पाने के लिए स्तुति आदि से प्रसन्न करता हूं. हे
इंद्र! अधिक वर्षा जिस प्रकार घास की वृद्धि करती है, उसी प्रकार तुम अभिचार से पीड़ित
इस पुरुष के बल और पुत्र, पौत्रादि सहित धन की वृद्धि करो. (१)
अस्मै क्षत्रमग्नीषोमावस्मै धारयतं रयिम्.
इमं राष्ट्रस्याभीवर्गे कृणुतं युज उत्तरम्.. (२)
हे अग्नि और सोम! इस यजमान में बल स्थापित करो और इसे धन प्रदान करो. तुम
इस यजमान को जनपद के उच्च वर्ग का सदस्य बनाओ. इस फल को पाने के लिए मैं उत्तम
यज्ञ कर्म करता हूं. (२)
सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति.
सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्व.. (३)
हे इंद्र! मेरे समान गोत्र वाला अथवा मुझ से भिन्न गोत्र वाला जो शत्रु मेरा विनाश करना
चाहता है, इन दोनों प्रकार के शत्रुओं को सोम अभिषव करने वाले यजमान के वश में करो.
(३)
सूक्त-५५ देवता—विश्वे देव
ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति.
तेषामज्यानिं यतमो वहाति तस्मै मा देवाः परि धत्तेह सर्वे.. (१)
जिन मार्गों से केवल देव ही जाते हैं, वे बहुत से मार्ग पृथ्वी और आकाश के मध्य
वर्तमान हैं. उन मार्गों में जो समृद्धि लाने वाला है, मुझे सभी देव उसी मार्ग पर स्थापित करें.
(१)
ग्रीष्मो हेमन्तः शिशिरो वसन्तः शरद वर्षाः स्विते नो दधात.
आ नो गोषु भजता प्रजायां निवात इद् वः शरणे स्याम.. (२)
ग्रीष्म, हेमंत, शिशिर, वसंत, शरद और वर्षा—इन छः ऋतुओं के अधिष्ठाता देव हमें
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