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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 304

सूर्य देव हमारे प्रति उपद्रव करने वाले राक्षस, पिशाच आदि का विनाश करते हुए पूर्व
दिशा में उदय होते हैं. सभी प्राणियों के द्वारा देखे गए और हमारे द्वारा अदृश्य राक्षसों आदि
के हंता आदित्य उदयाचल पर्वत से उदय होते हैं. (१)
नि गावो गोष्ठे असदन् नि मृगासो अविक्षत.
न्यू ३ र्मयो नदीनां न्य १ दृष्टा अलिप्तत.. (२)
सूर्योदय के कारण राक्षसों के विनाश से इस समय हमारी गाएं निर्भय हो कर गोशाला में
बैठी हैं तथा वन के पशु भी अपनेअपने स्थान पर निर्भय स्थित हैं. नदियों की तरंग सुख से
उठ रही है. रात्रि में न दिखाई देने वाली प्रजाएं सूर्य के प्रकाश में पूर्णतया देखी जा सकती हैं.
(२)
आयुर्ददं विपश्चितं श्रुतां कण्वस्य वीरुधम्.
आभारिषं विश्वभेषजीमस्यादृष्टान् नि शमयत्.. (३)
सौ वर्ष की आयु देने वाली, रोगशांति के उपाय जानने वाली, महर्षि कण्व द्वारा बताई
गई ओषधि तथा सभी रोगों का विनाश करने वाली शमी को मैं इस रोगी का रोग मिटाने के
लिए ले आया हूं. यह शमी रूप ओषधि दिखाई न देने वाले शरीर के मध्यवर्ती रोगों और
राक्षस आदि को शांत करे. (३)
सूक्त-५३ देवता—पृथ्वी आदि
द्यौश्च म इदं पृथिवी च प्रचेतसौ शुक्नो बृहन् दक्षिणया पिपर्तु.
अनु स्वधा चिकितां सोमो अग्निवायुर्नः पातु सविता भगश्च.. (१)
पृथ्वी और आकाश मेरे प्रति अनुग्रह वाले बन कर मुझे मनचाहा फल दें. दीप्तिशाली
और महान सूर्य दक्षिण दिशा से मेरी रक्षा करें. पितरों से संबंधित एवं स्वधा की अधिष्ठात्री
देवी मुझ पर अनुग्रह करें. सोम, अग्नि, वायु सविता और भग मेरी रक्षा करें. (१)
पुनः प्राणः पुनरात्मा न ऐतु पुनश्चक्षुः पुनरसूर्न ऐतु.
वैश्वानरो नो अदब्धस्तनूपा अन्तस्तिष्ठाति दुरितानि विश्वा.. (२)
मुख और नासिका द्वारा शरीर में प्रवेश करने वाला प्राण वायु तथा जीवात्मा हमें पुनः
प्राप्त हो. चक्षु और जीवन हमें पुनः प्राप्त हों. संसारभर के मनुष्यों के हितैषी, रोग आदि से
पराजित न होने वाले एवं शरीर के पालक अग्नि हमारे शरीर में स्थित रहते हैं. वे रोग के
कारण होने वाले सभी पापों का विनाश करें. (२)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिर्गन्महि मनसा सं शिवेन.
त्वष्टा नो अत्र वरीयः कृणोत्वनु नो मार्ष्टु तन्वो ३ यद् विरिष्टम्.. (३)
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