अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकी शक्ति प्रदान की है; घी, दूध देने वाली गाएं मेरे ऐसे अधिकार में रहें. (३)
सूक्त-१० देवता—अग्नि, वायु
पृथिव्यै श्रोत्राय वनस्पतिभ्यो ऽग्नये ऽ धिपतये स्वाहा.. (१)
पृथ्वी के लिए, शब्द सुनने के साधन कान के लिए, भूमि पर स्थित वृक्षों के अधिष्ठाता
देवों के लिए तथा धरती के स्वामी अग्नि के लिए हव्य शोभन आहुति वाला हो. (१)
प्राणायान्तरिक्षाय वयोभ्यो वायवे ऽ धिपतये स्वाहा.. (२)
वायु रूप प्राण के लिए, वायु से संबंधित अंतरिक्ष के लिए, पक्षियों के लिए तथा वायु के
अधिपति देवता के लिए यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (२)
दिवे चक्षुषे नक्षत्रेभ्यः सूर्यायाधिपतये स्वाहा.. (३)
आकाश के लिए, नेत्र के लिए, नक्षत्र के लिए तथा द्युलोक के अधिपति सूर्य के लिए
यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (३)
सूक्त-११ देवता—वीर्य
शमीमश्वत्थ आरूढस्तत्र पुंसुवनं कृतम्.
तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् स्त्रीष्वा भरामसि.. (१)
शमी वृक्ष स्त्री है और अश्वत्थ अर्थात् पीपल का वृक्ष पुरुष है. अग्निरूप पुत्र उत्पन्न
करने के लिए वह शमी वृक्ष पर आरूढ़ है. उसी पीपल वृक्ष से अरणियां बनाई जाती हैं, जो
अग्नि उत्पादन के काम आती हैं. इस प्रकार के अश्वत्थ पर पुंसवन किया गया है. वह पुंसवन
अर्थात् पुत्र प्राप्ति कर्म हम स्त्रियों में करते हैं. (१)
पुंसि वै रेतो भवति तत् स्त्रियामनु षिच्यते.
तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् प्रजापतिरब्रवीत्.. (२)
पुरुषमय बीजरूप वीर्य होता है. वह गर्भाधान कर्म के द्वारा नारी के गर्भाशय में डाला
जाता है. वही पुत्र प्राप्ति का साधन बनता है. यह पुंसवन कर्म प्रजापति ने बताया है. (२)
प्रजापतिरनुमतिः सिनीवाल्य चीक्लृपत्.
स्त्रैषूयमन्यत्र दधत् पुमांसमु दधदिह.. (३)
प्रजापति ने, अमावस्या की देवी सिनीवाली ने और पूर्णमासी के देवता ने गर्भाशय में
स्थित वीर्य के अंश से हाथ, पैर आदि की रचना की है. उन्होंने स्त्री के प्रसव संबंधी निमित्त
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