अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे.
एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (१)
हे पत्नी! जिस प्रकार लता चारों ओर से वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तू मेरा
आलिंगन कर. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार
मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (१)
यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहन्ति भूम्याम्.
एवा नि हन्मि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (२)
हे कामिनी! जिस प्रकार गरुड़ अपने निवास स्थान से उड़ता हुआ धरती पर अपने दोनों
पंखों को पटकता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय को पीड़ित करता हूं. जिस प्रकार तू मेरी
कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (२)
यथेमे द्यावापृथिवी सद्यः पर्येति सूर्यः.
एवा पर्येमि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (३)
हे नारी! सब का प्रेरक सूर्य जिस प्रकार इस आकाश और धरती को शीघ्र व्याप्त कर
लेता है, उसी प्रकार मैं तेरे मन को व्याप्त करूंगा. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे
समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (३)
सूक्त-९ देवता—कामात्मा
वाञ्छ मे तन्वं १ पादौ वाञ्छाक्ष्यौ ३ वाञ्छ सक्थ्यौ.
अक्ष्यौ वृषण्यन्त्याः केशा मां ते कामेन शुष्यन्तु.. (१)
हे कामिनी! तू मेरे शरीर, पैरों, नेत्रों और जंघाओं की कामना कर. तू ऐसे पुरुष की
कामना करती है, जो तुझे संतुष्ट कर सके. तेरी सुंदर आंखें और केश मेरे मन को व्याकुल
करते हैं. (१)
मम त्वा दोषणिश्लिषं कृणोमि हृदयश्लिषम्.
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (२)
हे पत्नी! मैं तुझे अपनी बांहों और हृदय में आश्रय लेने वाली बनाता हूं. इस प्रकार तू
मेरे संकल्प के अधीन होगी और मेरे चित्त को प्राप्त करेगी. (२)
यासां नाभिरारेहणं हृदि संवननं कृतम्.
गावो घृतस्य मातरो ऽ मूं सं वानयन्तु मे.. (३)
जिन के अंग आनंद प्राप्ति के साधन होते हैं और जिन के हृदय में विधाता ने वशीकरण
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