अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअर्थात् गर्भ को हम से पृथक् अर्थात् नारी में पुत्र रूपी संतान को एक वर्ष के पश्चात जन्म
लेने योग्य बनाया. (३)
सूक्त-१२ देवता—विष निवारण
परि द्यामिव सूर्यो ऽ हीनां जनिमागमम्.
रात्री जगदिवान्यूर्द्धसात् तेना ते वायरॆ विषम्.. (१)
जिस प्रकार सूर्य अंतरिक्ष में व्याप्त होता है, उसी प्रकार मैं सर्पों के जन्म को जानता हूं.
जिस प्रकार रात्रि अपने अंधकार से सारे संसार को व्याप्त कर लेती है, उसी प्रकार शरीर में
व्याप्त विष को मैं ओषधि से दूर करता हूं. (१)
यद् ब्रह्माभिर्यदृषिभिर्यद् देवैर्विदितं पुरा.
यद् भूतं भव्यमासन्वत् तेना ते वायरॆ विषम्.. (२)
जिस ओषधि को प्राचीन काल में मंत्रों ने, अगस्त्य, वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा इंद्र
आदि देवों ने जाना है, उन भूत, वर्तमान और भविष्यकाल की ओषधियों से मैं तेरे शरीर में
स्थित विष का निवारण करता हूं. (२)
मध्वा पृञ्चे नद्य १: पर्वता गिरयो मधु.
मधु परुष्णी शीपाला शमास्ने अस्तु शं हृदे.. (३)
गंगा आदि नदियां, हिमालय आदि विशाल पर्वत और छोटे पर्वत तेरे शरीर में विष
नाशक अमृत सींचें. शैवाल से युक्त परुष्णी नाम की नदी तेरे शरीर पर अमृत चुपड़े. यह
विषनाशक अमृत तेरे और मेरे हृदय के लिए सुखकारी हो. (३)
सूक्त-१३ देवता—मृत्यु
नमो देववधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः.
अथो ये विश्यानां वधास्तेभ्यो मृत्यो नमो ऽ स्तु ते.. (१)
इंद्र आदि के हनन साधन वज्र आदि को नमस्कार है, जिस से वे हमारा त्याग कर दें.
राजा से संबंधित आयुधों को नमस्कार है. हे मृत्यु! वैश्य जातियों के वध के जो साधन हैं, उन
से बचाने के लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं. (१)
नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः.
सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः.. (२)
हे मृत्यु! तेरा पक्षपात कर के वचन बोलने वाले दूत को तथा पराभव का वर्णन करने
वाले के लिए नमस्कार है. हे मृत्यु! तेरी अनुग्रहकारिणी बुद्धि के लिए एवं निग्रह करने वाली
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