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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 270 of 1063

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Page 270

यत् ते माता यत् ते पिता जामिर्भ्राता च सर्जतः.
प्रत्यक् सेवस्व भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा.. (५)
तेरी माता, तेरे पिता, तेरे भाई अथवा तेरी बहन ने जिस मंत्र अथवा ओषधि का प्रयोग
तेरे लिए निश्चित किया है, उसे भली प्रकार से सेवन कर. मैं तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने
वाला बनाता हूं. (५)
इहैधि पुरुष सर्वेण मनसा सह.
दूतौ यमस्य मानु गा अधि जीवपुरा इहि.. (६)
हे पुरुष! तू यमराज के दूतों का अनुकरण मत कर अर्थात् मर मत. तू अपने समस्त
परिवार जनों के साथ यहां जीवित रह. (६)
अनूहूतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः.
आरोहणमाक्रमणं जीवतोजीवतोऽयनम्.. (७)
तू उदय होने के मार्ग को जानने वाला है और इस यज्ञ कर्म के द्वारा बुलाया गया है.
उत्तरायण एवं दक्षिणायन तेरे जीवन में ही व्यतीत हों. (७)
मा बिभेर्न मरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा.
निर्वोचमहं यक्ष्ममङ्गेभ्यो अङ्ग़ज्वरं तव.. (८)
हे रोगी! तू भय त्याग दे, क्योंकि तू मरेगा नहीं. मैं तुझे वृद्धावस्था तक इस लोक में रहने
योग्य बनाता हूं. तेरे शरीर में से यक्ष्मा रोग और अस्थिगत ज्वर दूर हो चुका है. (८)
अङ्गभेदो अङ्ग़ज्वरो यश्च ते हृदयामयः.
यक्ष्मः श्येन इव प्रापप्तद् वाचा साढः परस्तराम्.. (९)
तेरे शरीर में व्याप्त ज्वर, तेरा हृदय रोग एवं यक्ष्मा रोग—ये सभी मेरे मंत्र रूपी बाणों से
तिरस्कृत हो कर उड़ने वाले बाज पक्षी के समान दूर जा कर गिरे हैं. (९)
ऋषी बोधप्रतीबोधावस्वप्नो यश्च जागृविः.
तौ ते प्राणस्य गोप्तारौ दिवा नक्तं च जागृताम्.. (१०)
जो बोध, प्रतिबोध, स्वप्न और जागृति नामक तेरे प्राणरक्षक ऋषि हैं, वे रातदिन जागते
रहें. (१०)
अयमग्निरुपसद्य इह सूर्य उदेतु ते.
उदेहि मृत्योर्गम्भीरात् कृष्णाच्चित् तमसस्परि.. (११)
यह अग्नि समीप रहने योग्य है. तेरे लिए सूर्य इसी लोक में उदय हो. तू गहरी, काली
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