अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे अग्नि! सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट होने के कारण इस पुरुष के अंगप्रत्यंग
पूर्णता को प्राप्त हों. इस गुणवान पुरुष को जीवित रहने के लिए नीरोग कीजिए. (१३)
एतास्ते अग्ने समिधः पिशाचजम्भनीः.
तास्त्वं जुषस्व प्रति चैना गृहाण जातवेदः.. (१४)
हे अग्नि! तुम्हारी ये समिधाएं पिशाचों को नष्ट करने वाली हैं. हे जातवेद! इन
समिधाओं को प्राप्त कर के तुम प्रसन्न बनो. (१४)
तार्ष्टाधीरग्ने समिधः प्रति गृह्णाह्यार्चिषा.
जहातु क्रव्याद्रूपं यो अस्य मांसं जिहीर्षति.. (१५)
हे अग्नि! तृषा शांत करने वाली इन समिधाओं को घी के साथ ग्रहण करो. जो राक्षस
इस पुरुष के मांस की इच्छा करता है, वह अपने कार्य से विमुख हो जाए. (१५)
सूक्त-३० देवता—आयु
आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः.
इहैव भव मा नु गा मा पुर्वाननु गाः पितॄनसुं बध्नामि ते दृढम्.. (१)
मैं समीप के देश से और दूर के देश से तेरे प्राणों को दृढ़ता से बांधता हूं. तू यहीं रह
और अपने पूर्ववर्ती पितरों का अनुकरण मत कर. (१)
यत् त्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणो जनः.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (२)
पितृऋण को न चुकाने वाले जिस पुरुष ने तुझ पर अधिकार किया है, मैं उस से छूटने
का उपाय अपने मंत्र बल से तुझे बताता हूं. (२)
यद् दुद्रोहिथ शेपिषे स्त्रियै पुंसे अचित्या.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (३)
तूने जिस स्त्री अथवा पुरुष के प्रति वैरभाव रखते हुए इस पापपूर्ण अभिचार का प्रयोग
किया है, मैं तुझे उस से मुक्त करने से संबंधित बात बताता हूं. (३)
यदेनसो मातृकृताच्छेषे पितृकृताच्च यत्.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (४)
तू अपने पिता अथवा माता द्वारा किए गए पाप के कारण रोगी हो कर शय्या पर पड़ा
है. मैं अपनी वाणी से उस रोग से उन्मोचन और प्रमोचन की बात तुझे बताता हूं. (४)
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