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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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और अंधकारपूर्ण मृत्यु से निकल कर जीवन को प्राप्त हो. (११)
नमो यमाय नमो अस्तु मृत्यवे नमः पितृभ्य उत ये नयन्ति.
उत्पारणस्य यो वेद तमग्निं पुरो दधे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (१२)
यमराज के लिए नमस्कार है. मृत्यु के लिए नमस्कार है. पितरों के लिए नमस्कार है. ये
तुझे ले जाने वाले हैं. जो अग्नि शरीर के पारण की विधि जानते हैं, वे तेरे कल्याण के लिए
आए हैं. मैं तुझे स्थापित करता हूं. (१२)
ऐतु प्राण ऐतु मन ऐतु चक्षुरथो बलम्.
शरीरमस्य सं विदां तत् पद्भ्यां प्रति तिष्ठतु.. (१३)
इस पुरुष को प्राण, नेत्र और बल प्राप्त हों. मैं ने इस के शरीर को मंत्र शक्ति के द्वारा
प्राण युक्त किया है. वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए. (१३)
प्राणेनाग्ने चक्षुषा सं सृजेमं समीरय तन्वा ३ सं बलेन.
वेत्थामृतस्य मा नु गान्मा नु भूमिगृहो भुवत्.. (१४)
हे अग्नि! तुम इस पुरुष को प्राण और चक्षु से युक्त करो तथा इस के शरीर में बल भर
दो. तुम अमृत के जानने वाले हो. यह इस लोक से प्रस्थान न करे और श्मशान इस का घर न
बने. (१४)
मा ते प्राण उप दसन्मो अपानो ऽ पि धायि ते.
सूर्यस्त्वाधिपतिर्मृत्योरुदायच्छतु रश्मिभिः.. (१५)
हे रोगी! तेरे प्राणों का क्षय न हो तथा तेरी अपान वायु भी तेरा त्याग न करे. सूर्य अपनी
किरणों द्वारा मृत्यु शय्या पर पड़े हुए तुझे उस से उठा दें. (१५)
इयमन्तर्वदति जिह्वा बद्धा पनिष्पदा.
त्वया यक्ष्मं निरवोचं शतं रोपीश्च तक्मनः.. (१६)
भीतर से हिलती हुई और मुख में बांधी हुई मेरी जीभ कहती है कि तुझे यक्ष्मा रोग ने
त्याग दिया है और तेरे ऊपर ज्वर का आक्रमण शांत हो गया है. (१६)
अयं लोकः प्रियतमो देवानामपराजितः.
यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जज्ञिषे.
स च त्वांनु ह्वयामसि मा पुरा जरसो मृथाः.. (१७)
यह पराजित न होने वाला मृत्युलोक देवों को भी प्रिय है. इस लोक में तूने मृत्यु के लिए
ही जन्म लिया है. वह मृत्यु तेरा आह्वान करती है. तू वृद्धावस्था से पहले मृत्यु को प्राप्त न
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