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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 268 of 1063

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Page 268

क्षीरे मा मन्थे यतमो ददम्भाकृष्टपच्ये अशने धान्ये ३ यः.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (७)
हे अग्नि! दूध में, मट्ठे में एवं कृषि द्वारा पके हुए अन्न में प्रविष्ट हो कर जो पिशाच इस
पुरुष को नष्ट करने की इच्छा कर रहा है, वह अपनी संतान के साथ कष्ट भोगे एवं यह पुरुष
रोग रहित हो जाए. (७)
अपां मा पाने यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (८)
जिस पिशाच ने मुझे जल पीने में, यात्रा करने में तथा सोते समय पीड़ित किया है, हे
अग्नि! वह संतान के सहित इसी प्रकार का कष्ट भोगे एवं यह पुरुष रोग रहित हो जाए. (८)
दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो३यमस्तु.. (९)
हे अग्नि! मुझे रात और दिन में यात्रा करते समय और सोते समय जिस मांस भक्षी
पिशाच ने पीड़ित किया है, वह अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष नीरोग हो जाए.
(९)
क्रव्यादमग्ने रुधिरं पिशाचं मनोहनं जहि जातवेदः.
तमिन्द्रो वाजी वज्रेण हन्तु च्छिनत्तु सोमः शिरो अस्य धृष्णुः.. (१०)
हे अग्नि! तुम मांसभक्षी, रुधिर पीने वाले तथा मन को कष्ट देने वाले पिशाच को नष्ट
करो. अश्व के स्वामी इंद्र उसे अपने वज्र से मारें तथा सोम उस का शीश काट लें. (१०)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (११)
हे अग्नि! तुम सदा से राक्षसों का मर्दन करते आए हो, राक्षस युद्ध में तुम्हें कभी नहीं
जीत सके हैं, तुम मांस भक्षियों को जला दो. ये तुम्हारे दिव्य अस्त्र से बच न सकें. (११)
समाहर जातवेदो यद्धृतं यत् पराभृतम्.
गात्राण्यस्य वर्धन्तामंशुरिवा प्यायतामयम्.. (१२)
हे अग्नि! इस मनुष्य का जो ज्ञान और मांस नष्ट हो गया है, उसे तुम पुनः इस के शरीर
में लाओ. यह सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट हो तथा इस के अंगप्रत्यंग पूर्ण हों. (१२)
सोमस्येव जातवेदो अंशुरा प्यायतामयम्.
अग्ने विरप्शिन् मेध्यमयक्ष्मं कृणु जीवतु.. (१३)
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