अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-२९ देवता—जातवेद
पुरस्ताद् युक्तो वह जातवेदोऽग्ने विद्धि क्रियमाणं यथेदम्.
त्वं भिषग् भेषजस्यासि कर्ता त्वया गामश्वं पुरुषं सनेम.. (१)
हे सभी कर्मों में प्रथम नियुक्त होने वाले अग्नि देव! मेरे द्वारा किए गए इस कार्य का
भार वहन करो. तुम ओषधि प्रदान करने वाले वैद्य हो. हम तुम्हारे द्वारा गाय, अश्व एवं
मनुष्यों को रोग रहित दशा में प्राप्त करें. (१)
तथा तदग्ने कृणु जातवेदो विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.
यो नो दिदेव यतमो जघास यथा सो अस्य परिधिष्पताति.. (२)
हे जातवेद अग्नि देव! जो हमारे विरुद्ध खेल खेल रहा है तथा जो हमारा भक्षण करना
चाहता है, सभी देवों के साथ मिल कर उस का परकोटा गिरा दो. (२)
यथा सो अस्य परिधिष्पताति तथा तदग्ने कृणु जातवेदः.
विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.. (३)
हे अग्नि! तुम सभी देवों के साथ मिल कर ऐसा यत्न करो, जिस से उस का परकोटा
गिर जाए जो हमारे विरोध में खेल खेल रहा है और जो हमें खाना चाहता है. (३)
अक्ष्यौ ३ नि विध्य हृदयं नि विध्य जिह्वां नि तृन्द्धि प्र दतो मृणीहि.
पिशाचो अस्य यतमो जघासाग्ने यविष्ठ प्रति तं शृणीहि.. (४)
जो पिशाच हमें खाना चाहता है, तुम उस की आंखें फोड़ दो, जीभ काट डालो और
दांत तोड़ दो. इस प्रकार तुम उस का विनाश कर दो. (४)
यदस्य हृतं विहृतं यत् पराभृतमात्मनो जग्धं यतमत् पिशाचैः.
तदग्ने विद्वान् पुनरा भर त्वं शरीरे मांसमसुमेरयामः.. (५)
हे अग्नि देव! इस का जो मांस पिशाचों ने इस के शरीर से नोंच कर खा लिया है, उसे
इस के शरीर में पुनः स्थापित कर दो तथा मंत्र शक्ति से इस के शरीर में प्राणों का पुनः संचार
कर दो. (५)
आमे सुपक्वे शबले विपक्वे यो मा पिशाचो अशने ददम्भ.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोऽयमस्तु.. (६)
हे अग्नि! जो पिशाच कच्चे, पक्के और चितकबरे पात्र में विशेष रूप से पके हुए एवं
कच्चे, पक्के भोजन में इस पुरुष के मांस को घोल कर हमारे विनाश की इच्छा कर रहा है,
वह पिशाच अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष आरोग्य को प्राप्त करे. (६)
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