अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextश्रेयःकेतो वसुजित् सहीयान्त्सङ्ग्रामजित् संशितो ब्रह्मणासि.
अंशूनिव ग्रावाधिषवणे अद्रिर्गव्यन् दुन्दुभेऽधि नृत्य वेदः.. (१०)
हे संग्राम में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू कल्याणी, धन जीतने वाली,
शक्तिशालिनी एवं मंत्र के द्वारा तीक्ष्ण बनाई हुई है. अधिश्श्रवण काल में पर्वत अपने पाषाण
खंडों को दबाता हुआ नृत्य करता है, उसी प्रकार तू भी शत्रुओं के धन पर अधिकार करती
हुई नृत्य कर. (१०)
शत्रुषाणीषादभिमातिषाहो गवेषणः सहमान उद्भिद्.
वाग्वीव मन्त्रं प्र भरस्व वाचं सांग्रामजित्यायैषमुद् वदेह.. (११)
हे दुदुंभि! तू ऐसा शब्द निकालती है, जो शत्रुओं की वाणी से टक्कर ले सके. तू
गवेषणा करने वाले बातूनी पुरुष के समान युद्ध जीतने के निमित्त शब्द करती हुई गूंज. (११)
अच्युतच्युत् समदो गमिष्ठो मृधो जेता पुरएतायोध्यः.
इन्द्रेण गुप्तो विदथा निचिक्यद्धृद्द्योतनो द्विषतां याहि शीघ्रम्.. (१२)
हे युद्ध में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू हर्ष से पूर्ण है एवं डिगती नहीं है. तू आगे
युद्ध में जा कर योद्धाओं की प्रेरक और युद्ध जीतने वाली है. इंद्र के द्वारा रक्षित तू शत्रुओं के
हृदयों को जलाती हुई उन के समीप जा. (१२)
सूक्त-२१ देवता—वानस्पत्य
विहृदयं वैमनस्यं वदामित्रेषु दुन्दुभे.
विद्वेषं कश्मशं भयममित्रेषु नि ध्मस्यवैनान् दुन्दुभे जाहि.. (१)
हे दुदुंभि! तू शत्रुओं में वैमनस्य फैला एवं उन के हृदयों में एकदूसरे के प्रति द्वेष भर दे.
हम अपने शत्रुओं में द्वेष की भावना फैलाना चाहते हैं. तू उन का तिरस्कार करती हुई उन्हें
समाप्त कर दे. (१)
उद्वेपमाना मनसा चक्षुषा हृदयेन च.
धावन्तु बिभ्यतो ऽ मित्राः प्रत्रासेनाज्ये हुते.. (२)
हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से
भयभीत हो कर भाग जाएं. (२)
वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिर्विश्वगोत्र्यः.
प्रत्रासममित्रेभ्यो वदाज्येनाभिघारितः.. (३)
हे वनस्पति से बनी हुई दुदुंभी! तू चमड़े से मढ़ी हुई है तथा मेघ घटा के समान घोर
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