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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 249 of 1063

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Page 249

संजयन् पृतना ऊर्ध्वमायुर्गृह्या गृहणानो बहुधा वि चक्ष्व.
दैवीं वाचं दुन्दुभ आ गुरस्व वेधाः शत्रूणामुप भरस्व वेदः.. (४)
हे दुदुंभि! तू उच्च शब्द करती हुई शत्रु सेनाओं को जीत लेती है. तू उन्हें पकड़ कर युद्ध
में विजय प्राप्त करती है. तू दैवी वाणी का उच्चारण कर और शत्रुओं का धन मुझे प्राप्त करा.
(४)
दुन्दुभेर्वाचं प्रयतां वदन्तीमाशृण्वती नाथिता घोषबुद्धा.
नारी पुत्रं धावतु हस्तगृह्यामित्री भीता समरे वधानाम्.. (५)
दुदुंभि की घोर गर्जना से शत्रुओं की नारियां होश में आ जाती हैं. वे युद्ध में मारे गए
शत्रुओं को देख कर भयभीत होती हैं और अपने पुत्र का हाथ पकड़ कर भाग जाती हैं. (५)
पूर्वो दुन्दुभे प्र वदासि वाचं भूम्याः पृष्ठे वद रोचमानः.
अमित्रसेनाम्अभिजज्जभानो द्युमद् वद दुन्दुभे सूनृतावत्.. (६)
हे दुदुंभि! तेरी ध्वनि सब से पहले निकलती है, इसलिए तू शत्रु सेना का विनाश कर
तथा पृथ्वी के ऊपर सत्य वचनों का प्रचार कर. (६)
अन्तरेमे नभसी घोषो अस्तु पृथक् ते ध्वनयो यन्तु शीभम्.
अभि क्रन्द स्तनयोत्पिपानः श्लोककृन्मित्रतूर्याय स्वर्धी.. (७)
हे दुदुंभि! धरती और आकाश के मध्य तेरी ध्वनियां अनेक रूपों में व्याप्त हों तथा
शोभन प्रतीत हों. तू उच्च शब्द से समृद्ध हो तथा मित्रों में वेग व्याप्त करने के लिए उच्च स्वर
से गर्जन कर. (७)
धीभिः कृतः प्र वदाति वाचमुद्धर्षय सत्वनामायुधानि.
इन्द्रमेदी सत्वनो नि ह्वयस्व मित्रैरमित्राँ अव जङ्घनीहि.. (८)
हे दुदुंभि! कुशलतापूर्वक बजाने पर तू मोहक शब्द निकालती है. शक्तिशाली मनुष्यों के
आयुधों को ऊंचा कर के तू उन्हें प्रसन्न बना. तू वीरों का आह्वान करती हुई हमारे मित्रों द्वारा
हमारे शत्रुओं का विनाश करा, क्योंकि तू इंद्र की प्रिया है. (८)
संक्रन्दनः प्रवदो धृष्णुषेणः प्रवेदकृद् बहुधा ग्रामघोषी.
श्रेयो वन्वानो वयुनानि विद्वान् कीर्तिं बहुभ्यो वि हर द्विराजे.. (९)
हे दुदुंभि! तू गर्जन करने वाले गौवों को गुंजित करने वाली, धनदात्री और सेना को
साहस प्रदान करने वाली है. तू कल्याण करने वाली एवं उत्तम पुरुषों को जानने वाली है. तू
इन दो राजाओं के युद्ध के मध्य अनेक वीरों को कीर्ति प्रदान कर. (९)
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