अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात्
ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१)
द्वे च मे विंशतिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (२)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस
अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२)
तिस्रश्च मे त्रिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (३)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस
अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३)
चतस्रश्च मे चत्वारिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (४)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे चार और
चालीस अर्थात् चवालीस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (४)
पञ्च च मे पञ्चाशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (५)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे पांच और
पचास अर्थात् पचपन हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (५)
षट् च मे षष्टिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (६)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छः और साठ अर्थात्
छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६)
सप्त च मे सप्ततिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (७)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सात और सत्तर अर्थात्
सतहत्तर हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (७)
अष्ट च मे ऽ शीतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (८)
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