अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकृत्यव्यधनि विध्य तं यश्चकार तमज्जहि.
न त्वामचकृषे वयं वधाय सं शिशीमहि.. (९)
हे संहार का साधन कृत्या! जिस ने तेरा निर्माण किया है, तू उसी का छेदन कर के मार
डाल. जिस ने तेरा निर्माण नहीं किया है, उस के वध के निमित्त हम तुझे शक्तिशालिनी नहीं
बनाते. (९)
पुत्र इव पितरं गच्छ स्वज इवाभिष्ठितो दश.
बन्धमिवावक्रामी गच्छ कृत्ये कृत्याकृतं पुनः.. (१०)
हे कृत्या! जिस प्रकार पुत्र पिता के पास जाता है, उसी प्रकार तू अपने उत्पत्तिकर्ता के
समीप जा. दबने पर जिस प्रकार सांप काट लेता है, उसी प्रकार तू उसे डस ले, जिस ने तुझे
बनाया है. जिस प्रकार टूटा हुआ बंधन अपने ही शरीर पर गिरता है, उसी प्रकार तू कृत्याकर्ता
के पास लौट जा. (१०)
उढेणीव वारण्यभिस्कन्दं मृगीव.
कृत्या कर्तारमृच्छतु.. (११)
कृत्या इस प्रकार अपने निर्माणकर्ता के पास जाए, जिस प्रकार ऐणी नाम की हिरनी,
हथिनी और मृगी शीघ्रता से झपटती है. (११)
इष्वा ऋजीयः पततु द्यावापृथिवी तं प्रति.
सा तं मृगमिव गृह्णातु कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१२)
कृत्या अपने निर्माण कर्ता की ओर उस के प्रतिकूल आचरण करती हुई अग्नि के समान
जाए. जैसे किनारे को काट कर गिराता हुआ जल का वेग मिलता है अथवा रथ जिस प्रकार
सरलता से मुड़ जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने निर्माणकर्ता से मिले. (१२)
अग्निरिवैतु प्रतिकूलमनुकूलमिवोदकम्.
सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१३)
अग्नि की तरह कृत्याकारी से प्रतिकूल आचरण करती हुई वह कृत्या उस के पास
पहुंचे. जिस प्रकार पानी किनारों को काटता हुआ बढ़ता है उसी प्रकार वह कृत्या कृत्याकारी
के अनुकूल हो कर उस के पास पहुंचे. वह कृत्या सुखकारी रथ के समान कृत्याकारी के पास
पुनः चली आए. (१३)
सूक्त-१५ देवता—मधुला ओषधि
एका च मे दश च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः.. (१)
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