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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 234 of 1063

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Page 234

यत् ते अपोदकं विषं तत् त एतास्वग्रभम्.
गृह्णामि ते मध्यममुत्तमं रसमुतावमं भियसा नेशदादु ते.. (२)
जल को दूषित करने वाला तेरा जो विष है, उसे मैं ने भीतर ही रोक लिया है. तेरे उत्तम
और मध्यम रस अर्थात् विष को मैं ग्रहण करता हूं. वह रस अर्थात् तेरा विष नष्ट हो जाए.
(२)
वृषा मे रवो नभसा न तन्यतुरुग्रेण ते वचसा बाध आदु ते.
अहं तमस्य नृभिरग्रभं रसं तमस इव ज्योतिरुदेतु सूर्यः.. (३)
मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से
तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार
यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३)
चक्षुषा ते चक्षुर्हन्मि विषेण हन्मि ते विषम्.
अहे म्रियस्व मा जीवीः प्रत्यगभ्येतु त्वा विषम्.. (४)
हे सर्प! मैं अपनी नेत्र शक्ति से तेरी नेत्र शक्ति का विनाश करता हूं तथा ऋषि के द्वारा
तेरे विष को समाप्त करता हूं. तू मृत्यु को प्राप्त हो, जीवित न रहे. तेरा विष तुझ पर ही बुरा
प्रभाव डाले. (४)
कैरात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ मे शृणुतासिता अलीकाः.
मा मे सख्युः स्तामानमपि छाताश्रावयन्तो नि विषे रमध्वम्.. (५)
हे सर्पो! तुम जंगल में घूमने वाले, काले धब्बों से युक्त, घास में रहने वाले, भूरे वर्ण
वाले, काले वर्ण वाले तथा निंदनीय हो. तुम हमारे कथन को सुनो. तुम हमारे सखा के घर के
समीप निवास मत करो. हमारा यह कथन तुम दूसरे सर्पों को भी सुना दो. (५)
असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च.
सात्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वनो वि मुञ्चामि रथाँ इव.. (६)
गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले
और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पों के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं,
जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६)
आलिगी च विलिगी च पिता च माता च.
विद्म वः सर्वतो बन्ध्वरसाः किं करिष्यथ.. (७)
हे सर्पो! तुम्हारे मातापिता आलिगी अर्थात् चिपकने वाले और विलिगी अर्थात् न
चिपकने वाले हैं. हम तुम्हारे सभी बंधुओं से परिचित हैं. तुम रसहीन अर्थात् विष हीन हो कर
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