अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवायु और अग्नि दिव्य हैं. मनुष्य होताओं में प्रमुख हैं. वे सुंदर वाणी वाले, यज्ञ के प्रेरक
एवं यज्ञ के निर्माता हैं. वायु होताओं पर अनुग्रह करते हैं और आह्वनीय अग्नि की सेवा का
आदेश देते हैं. अतएव यज्ञ पर उपकार करने वाले वायु और अग्नि देव मुझ पर भी उपकार
करें. (७)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वतीः स्वपसः सदन्ताम्.. (८)
सब प्राणियों को जल से संतुष्ट करने वाले अग्नि देव की कांति पृथ्वी का और सरस्वती
का आह्वान करने पर सचेत हो. सुंदर कर्म करने वाली ये तीन देवियां कुश पर विराजमान हों.
(८)
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद् भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९)
हे अग्नि! जो त्वष्टा देवता द्यावा पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों को अनेक रूप प्रदान करता
है, हमारी प्रेरणा से आज उस का यजन करो. (९)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०)
हे अग्नि देव! यह यज्ञ रूप अन्न देवों का भाग है. इसे और हवियों को प्रत्येक ऋतु में
देवों तक पहुंचाओ. वनस्पति, सविता देव और अग्नि इस हव्य को मधु और घृत से युक्त कर
के स्वादिष्ट बनाएं. (१०)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत् पुरोगाः.
अस्य होतुः प्रशिष्यतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११)
अग्नि देव प्रकट होते ही यज्ञ का आरंभ करते हैं और प्रकट होते ही समस्त देवों में
अग्रगण्य बन जाते हैं. देवों का आह्वान करने वाले इस अग्नि के मुख में देव गण स्वाहा शब्द
से युक्त हवि ग्रहण करें. (११)
सूक्त-१३ देवता—सर्प-विषनाशन
ददिर्हि मह्यं वरुणो दिवः कविर्वचोभिरुग्रैर्नि रिणामि ते विषम्.
खातमखातमुत सक्तमग्रभमिरेव धन्वन्नि जजास ते विषम्.. (१)
स्वर्ग के देवता वरुण ने मुझे उपदेश दिया है. उन के वचनों के द्वारा मैं तेरे विष को दूर
करता हूं. जो विष मांस के ऊपर अथवा मांस के भीतर है, उसे मैं ग्रहण करता हूं. जिस
प्रकार जल रेत में गिरने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तेरा विष नष्ट हो जाए. (१)
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