अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 352 of 405
Read in contextअठारहवाँ प्रकरण । ३४५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| महदादि = | महत्तत्त्व आदि | विहाय = | छोड़कर |
| द्वैतम् जगत् = | द्वैत जगत् | शुद्धबोधस्य = | शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप- वाले को |
| नाममात्र-विजृम्भितम् = | नाम-मात्र भिन्न है | किम् = | क्या |
| तत्र = | उसमें | कृत्यम् = | कर्तव्यता |
| कल्पनाम् = | कल्पना को | अवशिष्यते = | अवशेष रहती है ॥ |
भावार्थ ।
हे जनक ! महदादिरूप जितना जगत् है, अर्थात् महत्, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चमहाभूत और उनका कार्य-रूप जितना जगत् है, वह केवल नाम-मात्र करके ही फैला है, और आत्मा से भिन्न की नाईं प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में भिन्न नहीं है ।
वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति श्रुतेः ।
जितना कि नाम का विषय-विकार है, वह सब वाणी का कथन-मात्र ही है । मृत्तिका ही सत्य है ॥ १ ॥
इसी तरह जितना कि नाम का घटपटादि-रूप जगत् है, वह सब कल्पना-मात्र ही है, अधिष्ठान-रूप ब्रह्म ही सत्य है ।
जिस विद्वान् ने संपूर्ण कल्पना का त्याग कर दिया है, जो केवल शुद्ध चैतन्य-स्वरूप में ही स्थित है, उसको कोई कर्तव्य बाकी नहीं रहा है ॥ ६९ ॥
मूलम् ।
भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी ।
अलक्ष्यस्फुरणा शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥